गांधी जयन्ती (2016-10-02, शास्त्री जयन्ती भी): स्वच्छता दिवस राष्ट्र के स्तर पर

गांधी एवं शास्त्री जयंती

आज गांधी जयन्ती है, 1869 में जन्मे महात्मा यानी मोहनदास करमचंद गांधी जी का जन्म-दिवस। संयोग से आज ही का दिन पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी (जन्म 1904) का जन्मदिवस है। इस दिन का महत्व मुख्यतः गांधी जी के कारण ही है और लोग उनका किसी न किसी बहाने स्मरण कर लेते हैं। लगे हाथ शास्त्री जी को भी याद कर लेते हैं। शास्त्री जी का जन्मदिन यदि किसी और दिन होता तो शायद कम ही लोगों को उनका ध्यान आता।

गांधी जी सौभाग्यशाली थे कि उन्हें भारत की स्वतंत्रता का श्रेय पूरा-पूरा नहीं तो काफी हद तक दिया जाता है। उन्हें अहिंसा का पुजारी माना जाता है, और लोग यह धारणा कई लोगों के बीच है कि उन्होंने “खड्ग बिना ढाल” के देश को आजादी दिला दी। व्यक्तिगत स्तर पर मैं आजादी के लिए उन्हें अत्यधिक श्रेय नहीं देता। मेरा मानना है कि द्वितीय विश्वयुद्ध (सितंबर 1, 1939 से सितंबर 2, 1945 तक) के बाद ब्रिटेन (यूरोप के साथ) के हालात बिगड़ चुके थे और उसके लिए अपने सामाज्य को संभालना कठिन पड़ गया था। विगत 19वीं शताब्दी के मध्य के आगे-पीछे ही ब्रितानी शासन के अधीन के प्रायः सभी देश एक-एक कर स्वतंत्र होते गये। भारत तो वैसे ही बड़ा देश था जिसको संभालना ब्रितानी हुकूमत के लिए मुश्किल हो चुका था, विशेषतः जब देश में सर्वत्र आज़ादी-आज़ादी के नारे लग रहे थे। आज़ादी की उस मांग के माहौल के लिए अकेले गांधी जी उत्तरदायी नहीं, बल्कि अनेक जनों का उसमें योग दान था।

स्वतंत्रता के संदर्भ में गांधी जी के योगदान का आकलन भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न करेंगे ही। कुछ भी हो, गांधी जी को विश्व समुदाय ने आधुनिक काल के एक अतिविशिष्ट वक्तिव्य के धनी मानव के रूप में देखा। उनके विचारों का सर्वत्र प्रसार-प्रचार भी हुआ। कई देशों ने तो अपने खास-खास स्थानों पर उनकी प्रतिमाएं भी स्थापित कर दीं, और राष्ट्र संघ ने 2014 में तो उस दिन को विश्व अहिंसा दिवस घोषित भी कर दिया।

शास्त्री जी कदाचित देश के कुशल प्रधानमंत्री सिद्ध हुए होते, किंतु वे अपनी असामयिक मृत्यु के कारण केवल डेड़ साल (9 जून, 1964 से 11 जनवरी, 1966 तक) ही उस पद पर रह सके। पाकिस्तान के साथ 1965 में छिड़ी जंग के बाद ताशकंद में भारत-पाक शान्ति समझौते के बाद संदिग्ध हालत में उनकी मृत्यु हुई थी। उनकी मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी यह बहुतों का मानना है। अस्तु, अगर वे जीवित रहते तो शायद अधिक चर्चित रहे होते। सन् 1965 के युद्धकाल में उन्होंने “जय जवान जय किसान” का नारा दिया था। मुझे याद है जब उन्होंने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने को प्रेरित किया था। वे दिन थे जब देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था और अमेरिका से “पीएल 480 योजना” के अंतर्गत जीरानुमा गेहूं देश में आयात हो रहा था।

कहने का तात्पर्य है कि 2 अक्टूबर का दिन गांधी जी के कारण ही चर्चा का विषय रहा है। विगत गांधी जयंतियों पर मैंने अपने ब्लॉग में उनके विचारों को लेकर अपनी धारणाओं पर लेख लिखे हैं। (देखें 08-10-02, 09-10-02, 10-10-01, 13-10-0214-10-02, एवं 14-10-08 के ब्लॉग-पोस्ट।)

स्वच्छ्ता के विचार का अभाव

इस बार गांधी जयन्ती अहिंसा दिवस के तौर पर चर्चा में नहीं है, बल्कि स्वच्छता दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी ने 2014 में इसी दिन पर स्वच्छता की बात देश के सामने रखी। और इस बार इस दिन को राष्ट्र के स्तर पर स्वच्छता दिवस भी घोषित कर दिया (मैं शायद भूल नहीं कर रहा हूं)। यही इस बार मेरे लिए भी चर्चा का विषय है। तब से दो वर्ष बीत चुके हैं। उस दिशा में कुछ प्रगति जरूर हुई है, किंतु उतनी नहीं जितनी उम्मेद की जाती थी। मीडिया के माध्यम से लोगों को इस बारे में जागरूक करने की कोशशें काफी हुई, परंतु जन समुदाय प्रेरित हुआ इसमें मुझे शंका है।

मैं स्वयं से अक्सर पूछता हूं कि क्या सामाजिक सरोकार की बातों पर किसी व्यक्ति के मन में स्वयं विचार नहीं आने चाहिए? मेरे मन में स्वच्छता की बात किसी के कहने से नहीं आई बल्कि बचपन से वह मौजूद रही है। और तदनुसार मैं अपने परिवेश को यथासंभव साफ़-सुथरा रखने की कोशिश करता हूं। जब हम (मैं एवं मेरी पत्नी) जहां-तहां गंदगी देखते हैं तो बड़ी कोफ़्त होती है। हम राह चलते कुछ खाते-पीते हैं तो उसका कचरा जेब में या झोली में डाल लेते हैं, या खाना-पीना करते ही नहीं। रेल-यात्रा के दौरान फ़र्श पर कचरा न गिरे इसका ध्यान रखते हैं। कचरा इकट्ठा करके कागज आदि में लपेट कर पास में रख लेते हैं, या कूड़ेदान में डाल आते हैं। परंतु हमने देखा है कि कई लोग मूंगफली ठूंगते है तो छिलके फ़र्श पर गिराते जाते हैं। बिस्कुट का रैपर फ़र्श पर डाल देते हैं। वाश-बेसिन पर हाथ-मुंह धोते हैं तो बेसिन में ठीक-से पानी बहाकर उसे साफ नहीं रखते। टायलेट में शौच के बाद फ़्लश करके एक बार भी मुड़कर नहीं देखते कि फ़्लश हुआ भी कि नहीं। इस प्रकार के तमाम अनुभव देखने को मिलते हैं।

समझ में नहीं आता कि सफाई का खयाल क्यों नहीं आता? क्या सफाई की बात के लिए किसी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है? क्या यह ऐसा विषय है कि उच्च शिक्षा हासिल करना पड़े। मुझे सबसे बड़ा आश्चर्य तब होता है जब कोई व्यक्ति घर से गंतव्य के लिए निकलता है, और रास्ते में सड़क किनारे पेशाब करने से नहीं हिचकता है। ऐसा करते मैंने संभांत-से लगने वाले लोगों को भी देखा है। मेरे शहर वाराणसी में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने में डेड़-दो घटे से अधिक का समय नहीं लगता। ऐसे में यदि आप घर से शौच करके निकलें तो गंतव्य तक आपको पेशाब की कोई परेशानी नहीं हो सकती। तब भी वांछित अपनाकर क्यों नहीं चलता कूई? सड़क किनारे पेशाब न करनी पड़े ऐसा क्यों नहीं आता मन में? राह चलते सड़क पर जहां-तहां थूक देना आम बात है। विदेशों में लोग पेपर नैपकिन लेकर चलते है, ताकि जरूरत पड़ने पर उसमें थूककर पास के कूड़ेदान में फेंका जा सके, या जेब में रखा जा सके। क्यों ऐसा ही कोई तरीका देशवासियों को क्यों नहीं सूझता? कम से कम यह तो किया ही जा सकता है कि सड़क के किनारे घास-फूस या मिट्टी में थूका जाये। ध्यान रहे कि सड़क पर थूका गया साफ-साफ नजर आता है।

स्वच्छता-भाव बनाम सौन्दर्यबोध

मेरी धारणा है कि साफ-सफाई वास्तव में सौन्दर्य-बोध का अनन्य हिस्सा है, और आम भारतीयों में वह शायद बहुत कम है। यदि किसी को गंदगी देख बेचैनी नहीं होती, उस स्थल से भाग निकलने की उसकी इच्छा नहीं होती, अथवा तत्सदृश नकारात्मक प्रतिक्रिया उसके मन में नहीं जगती, तो उससे सफाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। चारों ओर गंदगी फैली हो ऐसे वातावरण से सांमजस्य बिठाने में बहुत से लोगों को दिक्कत नहीं होती। वे उसी वातावरण में जमीन में बैठ सकते हैं, गंदगी देखते हुए नाश्ता-पानी कर सकते हैं, इत्यादि। जब इन जनों को गंदगी खले ही नहीं तो उनसे सफाई की  उम्मीद कैसे की जा सकती है?

मेरा रोजमर्रा का अनुभव प्रमुखतया अपने शहर वाराणसी की दुर्व्यवस्था पर आधारित है। मैंने जितने भी शहर देखे हैं उनमें वाराणसी सबसे गंदा और प्रशासनिक उदासीनता का शिकार पाया है। (मैं अक्सर देश के विविध स्थलों की यात्रा कर लेता हूं।) दो वर्ष पहले जब स्वच्छता अभियान चला था तो लगा कि शहर के दिन बहुरेंगे। लेकिन कोई खास अंतर शहर में नहीं आया है। घरों से कूड़ा-उठान की व्यवस्था अवश्य है, लेकिन वह कूड़ा अक्सर सड़कों के किनारे गिरा दिया जाता है। यहां की व्यवस्था का वर्णन कर पाना मेरे लिए सरल नहीं है। शब्दों में वह बात नहीं होती जो प्रत्यक्ष दर्शन में है।

वाराणसी की गंदगी में कुछ योगदान तो आवारा गाय-सांड़ों का रहता है। यहां की गली-कूचों में कुछ लोग अपने निजी दूध के लिए अथवा उसके व्यवसाय के लिए गाय-भेंसे पालते हैं। मेरे घर के सामने की सड़क पर एक सज्जन (?) भी यह कार्य करते हैं। मेरी जानकारी के अनुसार शहर में पशु-पालन पर कोई प्रतिबंध नहीं है और न ही गंदगी फैलाने के विरुद्ध कोई कानून है। अतः यह कार्य धड़ल्ले से चलता आ रहा है। इस कार्य में सड़क पर अतिक्रमण भी होता है। अवश्य ही अतिक्रमण के विरुद्ध कानून हैं, परंतु प्रशासन में कोई देखने वाला हो तब न? साल-छः महीने में अतिक्रमण दस्ता आ भी जाये तो पशुओं को सड़क से हटा लिया जाता है और फिर बाद में स्थिति पूर्ववत। ये पशु हैं जो गोबर की गंदगी तो फैलाते ही हैं, उसके अलावा सड़क के किनारे का कूड़ा भी इधर-उधर बिखेर देते हैं।

%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%a8-a

बीते मार्च माह में उच्च न्यायालय ने राज्य (उत्तर प्रदेश) में पॉलिथीन की थैलियों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। आरंभ में लगा था कि अब खुली जगहों पर प्लास्टिक नहीं बिखरा दिखेगा। साग-सब्जी, किराना आदि की दुकानों पर पॉलिथीन थैली का मिलना बंद हो गया। लेकिन महीना बीतते-बीतते पॉलिथीन वापस। अब पूरी तरह पहले की स्थिति है। क्या अदालत ने प्रतिबंध हटा दिया? शायद नहीं, क्योंकि अखबारों मे तद्विषयक कोई समाचार कभी नहीं छपा। मेरा ख्याल है कि प्रशासन की उदासीनता इसका कारण रहा है।

मेरे ही घर के नजदीक मुख्य मार्ग के किनारे सब्जी-सट्टी भी लगती है उसके साथ फुटकर सब्जी की दुकानें। ये लोग अपनी सड़ी-गली सब्जी सड़क पर बिखेर देते हैं न कि उसको एकत्रित रखने की व्यवस्था अपनाते हैं। यह सड़ी-गली सागसब्जी ऊपर बताये आवारा पशुओं का आहार होता है, किंतु गंदगी तो हो ही जाती है। साग-सब्जी की दुकानें शहर में सड़क पर यत्र-तत्र अतिक्रमण करके लगी रहती हैं और गंदगी के स्रोत बने रहते हैं। वाराणसी में तम्बाकूदार पान का बहुत चलन है। लोग पान खाकर कहीं भी पीक थूक देते है। वाहनों में बैठे हुए भी थूकते हैं। और तो और, कार में बैठे जन भी चलते हुए उसका द्वार खोलकर पीक थूकते हैं, किसी की परवाह किए बगैर। कहने का मतलब यह है कि किसी को सद्विचार नहीं सूझते; बस जिसको जो सुविधा हो वह करता है।

वाराणसी की जैसी विकट स्थिति और नगरों की नहीं होगी, लेकिन गंदगी सभी जगह देखने को मिलती है। हाल ही में मैं मुम्बई के पश्चिम भांडूप इलाके में 3 सप्ताह के प्रवास पर गया था। छुट्टा पशु न होने के बावजूद वहां भी खूब गंदगी देखने को मिली, खासकर जंगल-मंगल नामक सड़क पर। दिल्ली के कई इलाकों में भी मैंने गंदगी देखी है। चार साल पहले मैंने पुद्दुचेरी की यात्रा की थी। तब एक नाले के पास से गुजरने पर बदबू के साक्षात्कार हुए थे और गंदगी के भी।

दरअसल अपने देश में संसाधन आबादी के हिसाब से बहुत कम हैं। बहुत-से लोगों को शहरों में सड़क किनारे झुग्गी-झोंपड़ी में जीवन बिताना होता है। उनकी सबसे बड़ी समस्या येनकेन प्रकारेण जीवित रहने की होती है। सुबह से शाम तक जीवन-धारण के साधन जुटाने में ही जिंदगी गुजर जाती है। किसे फ़ुर्सत है कि सफाई की सोचे?

मोदी जी गांधी जी के स्वच्छता के विचार से प्रभावित रहे हैं और स्वच्छता अभियान के सिलसिले में उनका नाम लेते रहते हैं। किंतु वे भी यह भूल जाते हैं कि गांधी जी के हर विषय पर अपने स्पष्ट एवं लीक से हटकर विचार रहे हैं। गांधी जी 

(1) शारीरिक परिश्रम पर जोर देते थे, न कि मशीनों पर अधिकाधिक निर्भरता,

(2) समाज में जाति, धर्म, क्षेत्र आदि पर आधारित भेदभाव के विरुद्ध थे, किंतु स्वतंत्र भारत में ऐसा भेदभाव बढ़ रहा है,

(3) आर्थिक विषमता न्यूनतम रहे यह चाहते थे, किंतु यह विषमता दिनों-दिन बढ़ रही है,

(4) आत्मसंयम के पक्षधर थे और सत्य तथा निष्ठा पर जोर देते थे, जो आज के नेताओं और आम जनों से गायब हो रहे हैं,

(5) इसी प्रकार की अनेक बातें करते थे, लेकिन उन पर कम ही लोग ध्यान देते हैं। – योगेन्द्र जोशी

2 अक्टूबरः गांधी जयंती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस और जननेता मोदी का स्वच्छता आह्वान (1)

स्वच्छता अभियान

 

 

 

 

गांधी-शास्त्री जयंती

2 अक्टूबर गांधी जयंती है । प्रायः सभी देशवासी इस दिन से सुपरिचित रहे हैं, क्योंकि प्रथमतः इस दिन सार्वजनिक अवकाश रहता है और द्वितीयतः गांधी के नाम को दुनिया में अहिंसक आंदोलन से जोड़कर देखा जाता है, जिसके कारण इस दिन को विश्व अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया गया है । कदाचित कम ही लोगों को यह याद रहता होगा कि “जय जवान जय किसान” का नारा देने वाले तथा सोमवार को सामूहिक उपवास रखने की अपील करने वाले देश के दूसरे प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री जी का जन्म भी इसी दिन हुआ था ।

मैं देश की स्वाधीनता का श्रेय गांधी को उतना नहीं देता जितना आम तौर पर दिया जाता है । अवश्य ही उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी, किंतु स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लेने वाले अनेकों स्मरणीय जननेताओं का योगदान कम नहीं रहा । वस्तुतः द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश सामाज्य की स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी थी कि उन्हें अपना सामाज्य संभालना कठिन लगने लगा था और एक-एक करके उन्हें तमाम बड़े देशों को स्वतंत्रता प्रदान करनी पड़ी थी । यह मेरा मत है जिसे लोग शायद स्वीकार न करें । मेरा यह आलेख स्वाधीनता के मुद्दे पर केंद्रित न होकर गांधी से जुड़े अन्य बातों पर केंद्रित है ।

गांधी और अहिंसा

निःसंदेह गांधी अहिंसा के पक्षधर थे, लेकिन कदाचित कायरता के पक्षधर नहीं थे । वे कठिन परिस्थिति में अपनी सुरक्षा के लिए हिंसक मार्ग अपनाने से हिचकने की सलाह देते रहे हों मैं ऐसा नहीं समझता । अस्तु, अहिंसा को केवल गांधी से जोड़कर ही क्यों देखा जाता है ? अनेक ऐसे महापुरुष हो चुके हैं जिन्होंने हिंसा का मार्ग त्यागने की सलाह दी है । यह ठीक है कि सभी समान रूप से सुविख्यात नहीं रहे हैं, पर उनको भुलाया नहीं जा सकता । भगवान महावीर, महात्मा बुद्ध, एवं प्रभु यीशु को तो दुनिया जानती ही है । वे सभी तो अहिंसा का उपदेश देते रहे । अवश्य ही उन्हें अहिंसक आदोलन चलाने की आवश्यकता नहीं रही, क्योंकि उनके काल में राजनैतिक परिस्थियां आधुनिक काल की सी नहीं रहीं । वस्तुतः गांधी स्वयं इन महापुरुषों से प्रेरित रहे हैं ।

सवाल है कि गांधी की चर्चा अहिंसा के संदर्भ में ही सर्वाधिक क्यों की जाती है । उन्होंने तमाम अन्य बातों पर भी जोर डाला था जिनको अपनाने की सलाह उन्होंने लोगों को दी थी । किंतु उन बातों की चर्चा आम तौर पर जोरशोर से नहीं की जाती है । मैं समझता हूं कि गांधी के अहिंसा की बात को सारी दुनिया इसलिए महत्व देती है क्योंकि हिंसा से प्रायः हर मनुष्य डरता है । हो सकता है कि आंतकवादी और उनके विरुद्ध लड़ने का दायित्व निभाने वाले सुरक्षकर्मी न डरते हों । अथवा स्वीकारे गए दायित्य के कारण उन्हें कदाचित निडरता बरतनी पड़ती हो । अतः अधिकांशतः सभी चाहेंगे हि मानव समाज हिंसामुक्त हो । मैं इस भावना को मनुष्य के स्वार्थ की प्रवृत्ति से जोड़कर देखता हूं, अर्थात उसकी इस अपेक्षा से कि अन्य जन उसको हानि न पहुंचाएं । गांधी की अन्य बातें मनुष्य के स्वार्थ के अनुरूप नहीं हैं, अतः उन बातों का पक्ष लेने और उन्हें जीवन में अपनाने में उन्हें असुविधा अधिक और व्यक्तिगत लाभ कम दिखता है ऐसा मैं मानता हूं । इसलिए लोग उन बातों को तवज्जू नहीं देते हैं । मैं अपने उक्त मत को सप्ष्ट करता हूं:

गांधी के विषय में व्यापक एवं शोधपरक अध्ययन मैंने नहीं किया है । अतः उनके बारे में बहुत कुछ तथा वह भी सही-सही जानता हूं यह दावा नहीं कर सकता । जितना मैं समझ पाया हूं उसके अनुसार वे अहिंसा के अतिरिक्त अधोलिखित बातों को महत्व देते थे और उन पर स्वयं अमल करते थे, न कि दूसरों को महज उपदेश भर देते थे:

गांधी – अहिंसा से आगे कुछ और भी

(1) स्वच्छता – गांधी का स्वच्छता पर विशेष ध्यान था । वे मानते थे कि हर व्यक्ति को स्वयं अपने हाथ से साफ-सफाई करनी चाहिए । यदि दूसरों का शौच आदि उठाने की जरूरत पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए । स्वच्छता से उनका ताप्तर्य दूसरों से सफाई करवाना नहीं था, बल्कि उसमें स्वयं भागीदारी निभाना था ।

(2) शारीरिक श्रम – गांधी शारीरिक श्रम के पक्षधर थे और यह विचार रखते थे कि मनुष्य को अपना कार्ययथासंभव अपने शारीरिक श्रम के संपन्न करना चाहिए । मशीनों पर निर्भरता कम से कम होना चाहिए । उन्हें किस स्थिति में इस्तेमाल करना चाहिए इस पर विवेकपूर्ण विचार होना चाहिए । मात्र आलस्य अथवा सुविधाभोग के लिए हमें अपने शारीरिक श्रम से नहीं बचना चाहिए । श्रम करने के लाभ क्या-क्या हैं यह तो लोग समझते हैं, किंतु उससे फिर भी बचते हैं । गांधी की नजर में व्यावसायिक तौर पर शारीरिक श्रम करने वालांे को हेय दर्जा देना अक्षम्य माना जाना चाहिए ।

(3) सादा जीवन – वे सादगी भरे जीवन के पक्षधर थे । शानो-शौकत और दिखावे का जीवन उनके विचारों के प्रतिकूल था । उनके मतानुसार व्यक्ति की श्रेष्ठता उसके विचारों से आंकी जानी चाहिए न कि उसकी भौतिक सपन्नता से । आज के युग में गांधी के कितने प्रशंसक होंगे जो अपनी आर्थिक संपन्नता के बावजूद सादा जीवन जीते हों । आज तो व्यक्ति ही संपन्नता ही उसकी सामाजिक श्रेष्ठता का आधार बन चुका है ।

(4) सामाजिक समानता – गांधी का मत था कि सभी मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए, सबको सम्मान दिया जाना चाहिए । यह सच है कि प्रकृति ने सबको समान नहीं बनाया है । परंतु  सभ्य समाज वही कहला सकता है जिसमें इस अंतर को भेदभाव का आधार न बनाया जाता हो । शारीरिक अथवा बौद्धिक स्तर पर कोई अधिक समर्थ होता है तो कोई कम । तदनुसार लोग अपना-अपना व्यावसायिक क्षेत्र चुनते हैं, परंतु उस क्षेत्र के आधार पर उन्हें ऊंचनीच की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए । धर्म, नस्ल, जाति, क्षेत्रीयता के आधार पर तो भेदभाव किया ही नहीं जा सकता, क्योंकि ये कृत्रिम आधार हैं – समाज में घर कर गईं विकृतियां । छुआछूत गांधी की दृष्टि में हिंदू समाज पर एक कलंक है ।

(5) कमजोर का शोषण न हो – अपेक्षया कमजोर व्यक्ति का शोषण विश्व के हर समाज में सदा से ही होता रहा है । गांधी चाहते थे कि हमें शोषण की प्रवृत्ति से स्वयं को मुक्त करना चाहिए । किंतु देखने में आता है कि समाज में कमजोर व्यक्ति से तरह-तरह से लाभ उटाये जाते हैं । कमजोर व्यक्ति से कम से कम पारिश्रमिक देकर अधिक से अधिक कार्य लेना आम बात है । दूसरों का हक छीनने में भी बहुतों को कोई संकोच नहीं होता है । वास्तव में देखा जाय तो समाज में फैले कदाचार का संबंध शोषण की प्रवृत्ति से ही है । वस्तुस्थिति का अपने हक में लाभ उठाना और दूसरों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में हानि पहुंचाना आम प्रवृत्ति है ।

(6) आर्थिक विषमता कम हो

कहा जा चुका है कि प्रकृति ने सबको समान नहीं बनाया है । अतः अर्थोपार्जन की क्षमताएं असमान है । अपने बौद्धिक कौशल से कोई असीमित संपन्नता अर्जित कर लेता है तो कोई अपनी सीमित क्षमताओं के कारण जीवन-यापन के लिए पर्याप्त साधन तक नहीं जुटा पाता है । फलतः समाज में आर्थिक विषमता स्वाभाविक तौर पर बढ़ती जाती है । गांधी का मत था कि सब असमान जन्म लेेते हैं के तर्क के साथ इस असमानता का औचित्य नहीं ठहराया जाना चाहिए । वे चाहते थे कि हमें ऐसी सामाजिक एवं शासकीय व्यवस्था अपनानी चाहिए जिससे यह अंतर कम से कम हो । इसका सीधा तात्पर्य यह है कि समाज में यह प्रवृत्ति पैदा की जानी चाहिए कि संपन्न वर्ग किंचित त्याग के लिए प्रस्तुत हो और कमजोर वर्ग को ऊठाने में योगदान दे ।

ये वे कुछ बातें हैं जो इस समय मेरे विचार में आ रही हैं । ऐसी अन्य बातें भी होंगी जो गांधी के चिंतन में रही हों । गौर करें तो देखेंगे कि ये बातें मनुष्य के विविध स्वार्थों के प्रतिकूल हैं – स्वार्थ जिनमें सुविधा भोगना, संपन्नता अर्जित करना, दूसरों पर वर्चस्व पाना, दायित्वों से बचना, आदि शामिल हैं ।

स्वच्छता अभियान

गांधी-चिंतन में जिस स्वच्छता को महत्व दिया गया है उसे आज मौजूदा प्रधानमंत्री मोंदी ने अपने स्वच्छता व्भियान का आधार बना लिया है । मोदी ने भविष्य में सतत चलने वाले इस अभियान के लिए गांधी जयंती को चुना है । देखने पर मोदी के इरादे सराहनीय लगते हैं । साथ में मेरे मन में ये सवाल भी उठते हैं:

(1) वे और उनके दल के लोग इस विषय पर कितने गंभीर होंगे ?

(2) उनकी खुद की सरकार तथा राज्यों की सरकारों की प्रतिवद्धता किस स्तर की होगी ?

(3) इस कार्य के लिए कैसे पर्याप्त संसाधन जुटाए जाएंगे ?

और (4) आम जन का कितना सहयोग उन्हें मिलेगा ?

ऐसे और भी प्रश्न हैं । इन प्रश्नों के उत्तर स्वयं मोदी के पास होंगे इसमें मुझे शंका है । उम्मीद पर दुनिया टिकी है, सो हमें सफलता की आशा करनी चाहिए । इस बारे में कुछ अधिक कहने से पहले मैं कांग्रेस पार्टी पर संक्षिप्त टिप्पणी करना चाहता हूं ।

कांग्रेस पार्टी गांधी पर अपना “कॉपीराइट” जताती है, जब कि गांधी स्वातंत्र्योत्तर भारत के किसी दल के नेता नहीं थे । वे पूर्व में एक जननायक थे और वही अंत तक रहे । कांग्रेस यह भूल जाती है कि वे उस कांग्रेस के नेता थे जो देश के स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत थी । और उन्होंने स्वतंत्र भारत में चुनाव लड़ने के लिए बने राजनैतिक दल के तौर पर कांग्रेस को नहीं स्वीकारा । वे उससे नाता तोड़ चुके थे । ऐसे में कांग्रेसियों का उन्हें अपने दल से जुड़ा होना कहना नितांत गलत है । वैसे भी कितने कांग्रेसी हैं जिन्होंने गांधी की जीवन शैली अपनाई हो ?  गांधी को अपना कहने वाले कांग्रेस के किसी नेता ने ऐसा अभियान क्यों नहीं चलाया ? क्यों नहीं स्वयं मनमोहन सिंह के दिमाग में स्वच्छता अभियान का खयाल आया ? अस्तु, गांधी के नाम पर किए जाने वाले मोदी के अभियान को कांग्रेस तथा अन्य दलों ने सहयोग देना चाहिए, न कि उस पर कोई टिप्पणी करनी चाहिए ।

शंकाएं

मैंने इस अभियान के संदर्भ में ऊपर कुछ सवाल उठाऐ हैं । अभियान किस हद तक सफल होगा और क्या अड़चनें मोदी के समक्ष होंगी इस पर मैं अपनी टिप्पणियां इस ब्लॉग की अगली पोस्ट में करूंगा । – योगेन्द्र जोशी

Tags: