11 जुलाई, विश्व जनसंख्या दिवस – भारत की विकट समस्या, जनसंख्या

विश्व जनसंख्या दिवस – उद्देश्य

आज, जुलाई 11, विश्व जनसंख्या दिवस है। क्या भारत के संदर्भ में इसकी कोई अहमियत है? मेरी नजर में नही!

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1989 में 11 जुलाई का दिन “विश्व जनसंख्या दिवस” के तौर पर घोषित किया था। असल में 1987 की इसी तारीख पर विश्व जनसंख्या उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित अनुमान के अनुसार 5 अरब को पार कर गई थी। संयुक्त राष्ट्र को तब लगा कि दुनिया की आबादी को नियंत्रित किया जाना चाहिए, और  इसके लिए सभी को जागरूक किया जाना चाहिए। उस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए दो वर्ष बाद इस दिन को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

उक्त जनसंख्या दिवस का उद्देश्य है सभी देशों के नागरिकों को बढ़ती आबादी से उत्पन्न खतरों के प्रति जागरूक करना और उन्हें आबादी नियंत्रण के प्रति प्रेरित करना। क्या भारत की सरकारें, यहां की संस्थाएं और सामान्य जन इस समस्या को कोई अहमियत दे पाए हैं? उत्तर नहीं में ही मिलता है।

भारत – अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि

ध्यान दें इस दिवस को अब 28 वर्ष हो रहे हैं। यह अंतराल छोटा नहीं; इस बीच पूरी एक नयी पीढ़ी पैदा हो चुकी है और उसके बाद की पीढ़ी पैदा होकर शैशवावस्था में आ चुकी है। यदि देश में जनसंख्या को लेकर कुछ भी सार्थक एवं कारगर किया जा रहा होता तो इन लगभग 3 दशकों में उल्लेखनीय परिणाम देखने को मिल चुके होते। जनसंख्या उसी रफ्तार से या थोड़ा-सा कम रफ्तार से अभी भी बढ़ रही है।  अपने देश की आबादी किस कदर बढ़ती गई है इसे आगे प्रस्तुत तालिका से समझा सकता है:

 वर्ष जनसंख्या

 करोड़ों में

  प्रतिशत वृद्धि

  प्रति 10-वर्ष

 जनसंख्या प्रतिशत

  1951 के सापेक्ष

1951 36.01 —– 100
1961 43.92 21.64 122
1971 54.81 24.80 152
1981 68.33 24.66 190
1991 84.64 23.87 235
2001 102.37 21.54 284
2011 121.02 17.64 336

1 करोड़  = 10 मिलियन  = 100 लाख

Source:  http://www.iipsenvis.nic.in/Database/Population_4074.aspx

गौर करें कि 1991 से 2011 के 20 वर्षों के अंतराल में ही देश में करीब 37 करोड़ लोग जुड़ गये और आबादी 1.43 गुना हो गई। और चिंता की बात यह है आज 1917 में अनुमानित आबादी 132-134 करोड़ बताई जा रही है। क्या सीखा देश ने इस जनसंख्या दिवस से? कौन-से कारगर तरीके अपनाए देश ने आबादी नियंत्रित करने के लिए?

मैं पाठकों का ध्यान इस तथ्य की ओर खींचता हूं कि चीन ने 1979 में एक-संतान की कानूनी नीति अपनाई। तब उसकी आबादी लगभग 98 करोड़ थी (भारत की करीब 68 करोड़ उसके सापेक्ष) आज वह 140 करोड़ आंकी जा रही है।

तस्वीर वर्ष 2024 की

हाल में संयुक्त राष्ट्र की विश्व जनसंख्या संबंधी रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसके अनुसार अगले सात वर्षों बाद 2024 में भारत की आबादी चीन के बराबर, फि र उसके अधिक हो जायेगी। यह अनुमान इन आंकड़ों पर आधारित है कि भारत की मौजूदा आबादी करीब 134 करोड़ और वृद्धि दर 1.1% प्रति वर्ष है जब की चीन की आबादी 140 करोड़ और वृद्धि दर मात्र 0.4 % प्रतिवेर्ष है।

इतना ही नहीं, अनुमान यह भी है कि 2030 आते-आते चीन की आबादी करीब-करीब स्थिर हो जायेगी और बाद के वर्षो में उसमें गिरावट भी आ सकती है। इसके विपरीत अपने देश की आबादी 2030 तक 150 करोड़  और बढ़ते हुए 2050 में 166 करोड़ हो जायेगी। उसके बाद उसके स्थिर होने की संभावना रहेगी।

मैं सोचता था कि देश के बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन, सरकारी तंत्र एवं शासन चलाने वाले राजनेता उक्त समाचार से चिंतित होंगे, मुद्दे को लेकर संजीदा होते हुए आम जन को सार्थक संदेश देंगे, और इस दिशा में कारगर कदम उठाने की बात करेंगे। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। किसी भी टीवी चैनल पर कोई बहस चली हो ऐसा भी शायद नहीं हुआ।

आबादी को लेकर कोई भी गंभीर नहीं जब कि यह देश के सामने खड़ी विकट समस्या है जिससे अन्य तमाम समस्याएं पैदा हो रही हैं।

1970 का दुर्भाग्यपूर्ण दशक

बढ़ती आबादी को लेकर जो उदासीनता देखने में आ रही है उसका मूल मेरे मत में 1970 का वह दशक है जिसमें आपातकाल लगा था, इंदिरा गांधी के तथाकथित अधिनायकवादी रवैये के विरुद्ध जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनांदोलन चला था, पहली बार कांग्रेस सत्ताच्युत हुई थी, विपक्षी दलों ने विलय करके जनता पार्टी बनाई और सत्तासीन हुए थे, आदि-आदि। इसी दशक में संजय गांधी (इंदिराजी के छोटे पुत्र) एक असंवैधानिक ताकत के तौर पर उभरे।

बीसवीं सदी के साठ-सत्तर के दशकों में भारत ने परिवार नियोजन की नीति अपनाई थी। मुझे उस समय के “हम दो हमारे दो” के नारे और परिवार नियोजन के कार्यक्रम का द्योतक चिह्न “लाल त्रिकोण” की याद अच्छी तरह है।

संजय गांधी को परिवार नियोजन की योजना बहुत भाई। उनका यह सोचना कि आबादी को बढ़ते देने से देश का दीर्घकालिक अहित निश्चित है। कार्यक्रम तो चल ही रहा था, उसको गति देने के लिए उन्होंने सत्ता से अपनी निकटता का भरपूर किंतु अनुचित लाभ उठाना आरंभ किया। उनके चाटुकारों की कोई कमी नहीं थी और जब वे जोर-जबरदस्ती परिवार नियोजन थोपने लगे तो परिणाम घातक हो गये। मैं उस समय की स्थिति का विवरण नहीं दे सकता। लेकिन वस्तुस्थिति का अंदाजा इसी उदाहरण से लगाया जा सकता है कि अस्पताल कर्मचारियों को नसबंदी के मामले खोज-खोजकर लाना आवश्यक हो गया, अन्यथा तनख्वाह/नौकरी पर आंच आ सकती थी। तब के जनांदोलन में संजय गांधी भी एक कारण बने।

तब परिवार नियोजन कार्यक्रम पर ऐसा ग्रहण लगा कि आज तक उसका कुफल देश को भुगतना पड़ रहा है। परिवार नियोजन ऐसा शब्द बन गया कि राजनेता उसे मुंह से निकालने से भी कतराने लगे। जनसंख्या वृद्धि रोकने की कवायत राजनीति से गायब हो गई। परिणाम?

आज की हमारी आबादी (132+ करोड़) तब (1974-75)  की आबादी (60-62 करोड़) के दोगुने से अधिक हो चुकी है। और जल्दी ही हम चीन को पछाड़ने वाले हैं। इस संभावना पर खुश होवें कि अपना माथा पीटें?

एक अन्य संबंधित समाचार मुझे पढ़ने को मिला (देखें: टाइम्ज़ अव् इंडिया), जिसके अनुसार 2050 तक भारत की मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की मुस्लिम आबादी से अधिक हो जायेगी। अभी सर्वाधिक मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की है, भारत से कुछ करोड़ अधिक। इस विषय की अधिक चर्चा मैं नहीं कर रहा हूं।

कई राज्यों का बेहतर कार्य

वे क्या कारण थे कि राजनेताओं ने बढ़ती आबादी पर खुलकर चर्चा नहीं की? ऐसा तो नहीं कि “आबादी नियंत्रण की कोशिश करने पर जनता कहीं नाखुश न हो जाए और हमें वोट न दें” यह विचार उनके दिमाग में गहरे घुस गया हो? या वे मुद्दे के प्रति एकदम उदासीन हो गए हों। कारण कुछ भी हों देश को बढ़ती आबादी का दंश तो झेलना ही पड़ रहा है।

फिर भी कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में रुचि ली और उसके परिणाम उन्हें मिले भी हैं।

यहां उल्लेख कर दूं कि विषय के जानकारों के अनुसार जनसंख्या के स्थिरता (वृद्धि दर शून्य) के लिए प्रजनन दर करीब 2.1 प्रति स्त्री होनी चहिए। इससे कम पर आबादी घटने लगती है। मैं कुछ गिने-चुने राज्यों के प्रजनन दर के आंकड़े (वर्ष 2016) प्रस्तुत करता हूं (स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_states_ranking_by_fertility_rate):

1) सिक्किम – 1.2 !

2) केरला, पंजाब – 1.6

3) गोवा, तमिलनाडु, त्रिपुरा, दिल्ली, पुद्दुचेरी = 1.7

4) आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल = 1.8

5) हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र = 1.9

6) गुजरात, जम्मू कश्मीर = 2.0

7) अरुणाचल, उत्तराखंड, ओडीसा, हरयाणा = 2.1 

8) आसाम, छत्तीसगढ़ = 2.2

9) मध्य प्रदेश, मिजोरम = 2.3

10) राजस्थान = 2.4

11) झारखंड, मणिपुर = 2.6

12) उत्तर प्रदेश, ) नगालैंड = 2.7 ?

13) मेघालय = 3.0 ?

14) बिहार = 3.4 ?

पूरे देश का औसत प्रजनन दर  2.2  है, स्थिरता वाले मान से थोड़ा अधिक।

इन आंकड़ों को शब्दश: नही लिया जाना चाहिए, किंतु इससे अलग-अलग राज्यों की स्थिति का अंदाजा अवश्य लगता है। छोटे राज्यों का प्रदर्शन अपेक्षया बेहतर रहा है। किंतु उत्तर प्रदेश एवं बिहार जैसे विशाल राज्यो के लिए ये प्रजनन दर अभी बहुत अधिक है, बिहार के लिए तो एकदम चिंताजनक। उत्तर प्रदेश की स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं होगी जितना उपर्युक्त जानकारी संकेत देतीहै।

जनसंख्या वृद्धि एक गंभीर समस्या है इसे एक बच्चा भी समझ सकता है। हमारे प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं। भूक्षेत्र बढ़ नहीं सकता, बनीय क्षेत्र सीमित है, जल से स्रोत सीमित हैं, आदि-आदि। तब इतनी-सी सामान्य बात शासन चलाने वाले और जनता क्यों नहीं समझ पाते हैं कि बढ़ती जनसंख्या के लिए इन संसाधनों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता घटती जाएगी। – योगेन्द्र जोशी

 

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11 जुलाई 2015 – विश्व जनसंख्या दिवसः किंतु अपने देश को उससे कोई मतलब नहीं

जनसंख्या दिवस

आज 11 जुलाई ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ था/है । मैं उम्मीद कर रहा था कि इस दिन देश की जनसंख्या पर विभिन्न व्यक्तियों-संगठनों के बीच गंभीर चर्चा होगी, और मीडिया मुद्दे को जनता तक पहुंचाएगा तथा जनता में जागरूता फैलाएगा । मेरे लिए यह देखना आश्चर्य एवं खेद की बात थी कि अखबारों में इस विषय का कहीं कोई उल्लेख ही नहीं, किसी संस्था या सरकार की कोई विज्ञप्ति नहीं । टीवी चैनलों पर भी कोई जिक्र नहीं, गोया कि जनसंख्या वृद्धि का हससे कुछ लेना-देना नहीं ।

अभी हाल ही में देश के प्रधानमंत्री मोदीजी ने बड़े जोशोखरोश के साथ ‘विश्व योग दिवस’ मनाया । कई-कई दिनों तक उसकी तैयारी चली । लोगों ने बढ़चढ़कर सहभागिता निभाई । योग की उपादेयता में मैं संदेह नहीं करता, लेकिन ये सवाल जरूर उठाता हूं कि जिस देश में लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब न हो रही हो, जहां 40-50 फीसदी बच्चे कुपोषित हों, जहां लोगों को सड़कों पर रातें गुजारनी पड़ती हों, जहां जीवन-निर्वाह के लिए दिन भर आदमी भागदौड़ में लगा हो, वहां योग का लाभ कितने लोग उठा सकते हैं ?

मैं उम्मीद कर रहा था कि प्रधानमंत्री जी जनसंख्या दिवस को भी अहमियत देगें और जनसंख्या नियंत्रण की बातें जनता के बीच करेंगे । यह ठीक है कि योग दिवस उनके दिमाग की उपज थी, लेकिन उसके सापेक्ष जनसंख्या दिवस महत्वहीन बना के छोड़ना प्रधानमंत्री जी को शोभा नहीं देता । जनसंख्या इस देश की अतिगंभीर समस्या है यह उन्हें नहीं भूलना चाहिए था ।

दिवस की अहमियत

याद रहे कि इस दिवस के पीछे संयुक्त राष्ट्र संगठन (सं.रा.सं. अथवा यू.एन.ओ.) का एक ध्येय रहा है । ध्येय है कि इस विश्व की मानव जनसंख्या लगातार नहीं बढ़ने दी जा सकती है । प्रकृति ने हमें सीमित संसाधन दिए हैं । हमें और हमारे साथ-साथ अन्य प्राणियों को उन्हीं संसाधनों को ध्यान में रखते हुए जनसंख्या सीमित रखनी है । मानवेतर प्राणियों की जनसंख्या प्रकृति सीधे तौर पर नियंत्रित करती है । उन प्राणियों के लिए न जनसंख्या के कोई अर्थ हंै और न ही उसे सीमित रखने का कोई विचार ।

किंतु मनुष्य की स्थिति भिन्न है । उसने अपने बौद्धिक बल के सहारे रोगों पर काफी हद तक नियंत्रण पाया है जिससे मृत्यु दर घटी है । इसके अतिरिक्त प्राकृतिक विपदाओं के कारण से होने वाली मौतों को भी कुछ हद वह रोकने में समर्थ हुआ है । फलतः परिस्थितियां ऐसी बन चुकी हैं कि उसकी जनसंख्या वढ़ती जाएगी यदि उसे रोकने के प्रयास न किए जाएं । मृत्यु दर कम हो ऐसा विचार तभी ठीक माना जा सकता है जब जन्म दर भी उसी के अनुरूप कम हो । अन्यथा जनसंख्या उस सीमा तक पहुंच जाएगी जहां जीवन-निर्वाह के संसाधन कम पड़ने लगेंगे । उस सीमा पर या तो प्रकृति अपने तरीके से जनसंख्या नियंत्रित करेगी, या मनुष्य स्वयं को विपरीत परिस्थितियों से लड़ने में असमर्थ पाकर आत्म-हनन का रास्ता चुनने लगेगा । ऐसी भयावह स्थिति न पैदा हो इसी प्रयोजन से सं.रा.सं. ने 11 जुलाई को जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता की याद दिलाने वाले दिवस के रूप में स्थापित किया है ।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस धरती पर केवल हमें (हम मनुष्य) ही जीने का अधिकार नहीं है, बल्कि अन्य प्राणियों को भी अधिकार है । वैसे भी उनके अस्तित्व पर हमारा अस्तित्व टिका है, भले ही इस तथ्य का एहसास अधिकांश लोगों को न हो । वर्तमान काल में बढ़ती जनसंख्या हमें पूरी धरती पर एकाधिकार जमाने के लिए प्रेरित या विवश कर रही है । उन प्राणियों के लिए उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन भी हम कब्जे में ले रहे हैं । परिणाम यह है कि उनमें से कइयों की संख्या घट रही है और कुछ तो विलुप्ति के कगार पर हैं । वे हमारी दया के पात्र बन चुके हैं । ऐसी संभावना राकने के लिए भी जनसंख्या नियंत्रण बांछित है ।

इस धरती का सौभाग्य है कि विकसित देशों की जनसंख्या वृद्धि कमोबेश नियत्रण में है । कई देश तो नकारात्मक (ऋणात्मक) जनसंख्या दर पर चल रहे हैं, अर्थात उनकी जनसंख्या समय के साथ घट रही है; कारणों में विविधता है । इनमें रूस, पोलैंड, जापान, क्यूबा आदि के साथ यूरोप के कई छोटेबड़े देश शामिल हैं । इस विषय की विस्तृत जानकारी निम्नलिखित इंटरनेट पते पर प्राप्य है:

https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_countries_by_population_growth_rate

भारत की स्थिति

दुनिया के प्रमुख देशों में भारत के अतिरिक्त शायद ही कोई अन्य देश हो जिसकी जनसंख्या दर आवश्यकता से अधिक हो । विकसित देशों के लोगों की आर्थिक संपन्नता और उनका लगभग सौ फीसदी शिक्षित होना ही जनसंख्या नियंत्रण का आधार बन गया । चीन ने कानून की सख्ती से जनसंख्या को काबू में किया । लेकिन अपने देश की स्थिति निराशाजनक रही है । यहां तो कोई राजनेता जनसंख्या नियंत्रण की बात सपने में भी नहीं करता । इसका कारण है 1970 के दशक की संजय गांधी की एक भूल । किसी संवैधानिक पद पर न होते हुए भी उसने सरकारी महकमों पर अपना नियंत्रण पा लिया था । परिवार नियोजन उस व्यक्ति के कार्यक्रमों में से एक था । उसके इरादे तो नेक थे किंतु कार्यप्रणाली जोर-जबरदस्ती वाली थी, जिसके दुष्परिणाम तब कांग्रेस को भुगतने पड़े थे । तत्कालीन घटनाओं ने परिवार नियोजन को ऐसा विषय बना दिया जिसको जबान पर लाना राजनेताओं के लिए वर्जित हो गया । सबको यह भय सताने लगा कि जनसंख्या की बात करेंगे तो हमारा वोटबैंक खिसक जाएगा । हमारे लोकतंत्र की यह दुःखद विडंबना है ।

लेकिन यह समझना जरूरी है कि अगर जनसंख्या बढ़ती जाए तो देश प्रगति नहीं कर सकता । हमने जनसंख्या को भगवान भरोसे छोड़ रखा है । दक्षिण भारत के चार राज्यों के साथ कुछ अन्य राज्यों ने अच्छी प्रगति दिखाई है और वहां लोगों का जीवन-स्तर अपेक्षया उठा भी है । वहां प्रति दम्पती जन्मे बच्चों  की संख्या 2 के निकट है । यह माना जाता है कि करीब 2.3 बच्चे प्रति दम्पती जनसंख्या को स्थिरता प्रदान करती है, न बढ़ना न घटना । लेकिन सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के साथ बिहार, मध्यप्रदेश आदि में यह संख्या 3 से ऊपर है । अर्थात इन प्रदेशों की जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है । लगता नहीं कि यहां की सरकारें गंभीर प्रयास की इच्छुक हैं ।

जनसंख्या के संदर्भ में एक रोचक तथ्य मेरे देखने में आया है कि आज के अपेक्षया संपन्न मध्य एवं उसके ऊपर के वर्ग में परिवार को 1 या 2 बच्चों तक सीमित रखने का चलन बढ़ रहा है । कुछ कामकाजी दम्पती तो “एक भी बच्चा नहीं” के हिमायती मिल जाएंगे । ये वे वर्ग हैं और जो अधिक बच्चों के भरण-पोषण स्वास्थ्य एवं शिक्षा आदि का निर्वाह कर सकते हैं । फिर भी परिवार सीमित रखकर ये जनसंख्या स्थिरीकरण में योगदान दे रहे हैं ।

असल समस्या समाज के निम्नतर वर्गों के साथ । धनाभाव के कारण वे कुपोषण, शिक्षा के अभाव, स्वास्थ्य की समस्याओं आदि से घिरे रहते हैं । फिर भी परिवार में बच्चों की संख्या वहीं अधिक देखी जाती है । कारण भले ही कुछ भी हों वहां चार-चार, छः.छः बच्चों की पैदाइश सामान्य बात है । देश की जनसंख्या वृद्धि इन्हीं के कारण है । इस समय आवश्यकता इन्हीं को ऊपर उठाने की है । जब तक इन तबकों में परिवार सीमित रखने की भावना न पैदा होगी स्थिति में वांछित बदलाव नहीं हो सकेगा, क्योंकि जब तक कुछ जने गरीबी से उबर पाते हैं तब तक कई अन्य गरीब पैदा हो चुकते हैं ।

जनसंख्या दिवस इनमें जागरूकता फैलाने का दिन है; उन्हें यह विश्वास दिलाने का दिन है कि सीमित परिवार उनके लिए घाटे का सौदा नहीं है क्योंकि सरकार उनका साथ देगी । दुर्भाग्य से आज इस दिवस पर प्रधानमंत्री जी ने वांछित संकल्प लेने की कोशिश नहीं की । अतः जनसंख्या का स्थिरीकरण भगवान भरोसे । – योगेन्द्र जोशी

 

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11 जुलाई – विश्व जनसंख्या दिवस और इंडिया बनाम भारत

बधाई एवं शुभकामना

आज विश्व जनसंख्या दिवस (World Population Day) है । इस अवसर पर मैं अपने देशवासियों को बधाई और शुभकामना देना चाहता हूं ।

बधाई इस बात पर कि अपना ‘इंडिया दैट इज भारत’ शीघ्र ही सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा । अभी चीन की जनसंख्या सर्वाधिक है किंतु उसकी आबादी नियंत्रण में है । विशेषज्ञों के अनुसार वह अधिकतम करीब 140 करोड़ के आंकड़े को छुएगी । अभी वह 135 के आसपास है । अपने इंडिया दैट इज भारत की आबादी फिलहाल 120 करोड़ से ऊपर है । जिस रफ्तार से वह बढ़ रही है उसे देखते हुए उसे 140 करोड़ पहुंचने में 15 वर्ष से अधिक का समय नहीं लगना चाहिए । थोड़ा विलंब हो भी गया तो भी 20 साल के भीतर तो हम चीन से आगे बढ़ ही जाएंगे । तब हम सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन ही जाएंगे । हम अपने को किसी क्षेत्र में – चाहे जनसंख्या का ही क्षेत्र क्यों न हो – सर्वोंपरि सिद्ध कर लेंगे । क्या यह छोटी-मोटी उपलब्धि होगी ? इसी बात पर मेरी देशवासियों के प्रति बधाई !

साथ में मेरी शुभकामना भी । अपना देश इस बढ़ती जनसंख्या के बोझ को किसी प्रकार वहन कर सके ऐसी शुभेच्छाएं लोगों के प्रति हैं । ऊपर वाले से मेरी प्रार्थना है – अगर वह किसी की सुनता हो तो – कि दुनिया के सभी कुपोषित, भूखे, रुग्ण, अनपढ़ एवं बेरोजगार यहीं हों ऐसी मेहरबानी कृपया न करे । देश भगवान भरोसे है, आगे भी रहेगा, इसलिए उससे प्रार्थना करना निहायत जरूरी है ।

जनसंख्या दिवस – औचित्य?

वैसे ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ मनाने का क्या औचित्य है यह मैं आज तक समझ नहीं सका । दीवाली हो तो पटाखे छुड़ाऊं, होली हो तो मित्रों के अबीर-गुलाल लगाऊं, ईद हो तो सेवई खाने-खिलाने की सोचूं, किसी महापुरुष का जन्मदिन हो तो भी जश्न मनाने की सोचूं, आदि-आदि । लेकिन इस दिन को कैसे मनाऊं ?

आप कहेंगे कि जनसंख्या वृद्धि को लेकर कुछ करिए । क्या करूं ? क्या कर सकता हूं मैं ? अपने हाथ में है क्या ? आप कहेंगे लोगों को समझाएं । साल में एक दिन ऐसा करना क्या माने रखता है ? साल के एक दिन क्या किसी शराबी को शराब न पीने की, किसी तंबाकूबाज को सिगरेट न पीने की, सलाह दे दें तो क्या वह मान जाएगा ? बार-बार याद दिलाने पर भी कुछ काम बनेगा इसकी भी आशा मैं नहीं कर पाता । किसी को सलाह देने पर वह कह सकता कि आप परेशान न हों; मेरे परिवार का पेट आपको नहीं भरना पड़ेगा । वह यह भी कह सकता है कि परिवार की वृद्धि तो ऊपर वाले की मरजी से है, मैं भला क्या करूं । वह ऐसे ही तमाम तर्क दे सकता है । मेरे पास समझाने को कुछ नहीं । जिसे ‘सन्मति’ होगी उसे समझाने की जरूरत नहीं, और जिसे नहीं है, उसके मामले में ‘भैंस के आगे बीन बजे, भैंस खड़ी पगुराय’ वाली कहावत लागू होती है ।

यों भी अपने देश में इस दिवस की कोई अहमियत नहीं । हमारे सरकारों, राजनैतिक दलों, प्रशासनिक अधिकारियों एवं बुद्धिजीवियों ने इस मुद्दे को दशकों पहले तिलांजलि दे दी थी । मुझे पिछली सदी के साठ-सत्तर के दशकों की याद है, जब मैं युवावस्था में प्रवेश कर चुका था और परिवार नियोजन के अर्थ समझने लगा था । वे दिन थे जब ‘हम दो हमारे दो’ जैसे नारे जहां-तहां दिखाई-सुनाई पड़ते थे । सड़क किनारे होर्डिंगों, बसों, पत्र-पत्रिकाओं के पृष्ठों आदि पर ‘उल्टा लाल तिकोन’ के निशान दिखते थे । नियोजित परिवार के पक्ष में विज्ञापनों एवं अन्य साधनों का सहारा लिया जाता था ।

पटरी से उतरा परिवार नियोजन कार्यक्रम

तब परिवार नियोजन की गाड़ी चल तो रही थी । इसे देश का दुर्भाग्य कहें कि सौभाग्य यह तो आप जानें कि गाड़ी पटरी से उतरी तो उतरी ही रह गई । ठप हो गयी तो हो गयी । सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिराजी के कनिष्ठ पुत्र, स्व. संजय गांधी, के मन में यह जोशीला विचार उठा कि जनसंख्या पर जबर्दस्त तरीकों से नियंत्रण किया जाना चाहिए । उनके बारे में लोगों में यह धारणा व्याप्त थी कि सत्ता पर उनका जोरदार प्रभाव था, और उनके कार्यक्रम के विरोध का साहस सत्तापक्ष में किसी को नहीं था । वे सत्ता में न होते हुए भी सत्ता की हैसियत रखते थे । उनके जोश का परिणाम था कि गाड़ी ने तेज रफ्तार पकड़ी और पटरी से ऐसी उतरी कि फिर पटरी पर चढ़ नहीं सकी । उसके बाद आपात्काल घोषित हुआ, सत्ता परिवर्तन हुआ, कालांतर में श्री संजय गांधी भी इहलोक से विदा हो गये, इत्यादि ।

उस काल की घटनाओं का परिणाम यह रहा कि सभी राजनैतिक दलों ने कसम खा ली कि अब जनसंख्या नियंत्रण की बात सपने में भी नहीं की जानी चाहिए । चूंकि जनसंख्या वृद्धि के बाबत चिंता सारी दुनिया में व्यक्त की जा रही है, अतः इस देश को भी उस कोलाहल में चीखना ही है । लेकिन यह चीखना सतही एवं दिखावे का है, गंभीरता कहीं नहीं है ।

मामला इंडिया बनाम भारत

और असल सवाल तो यह है कि आबादी बढ़ किसकी रही है ? ‘इंडिया’ की कि ‘भारत’ की ? याद रहे यह देश दो खंडों में बंटा है, इंडिया एवं भारत । इंडिया की पॉप्युलेशन नहीं बढ़ रही है । वहां टू-चाइल्ड, वन-चाइल्ड अथवा नो-चाइल्ड नॉर्म प्रैक्टिस में आ चुका है । वहां कि समस्याएं वही नहीं हैं जो भारत की है । वह तो वाकई शाइन कर रहा है । जनसंख्या वृद्धि तो भारत की समस्या है, जहां एक-एक परिवार में छः-छः, सात-सात बच्चे पैदा हो रहे हैं, जिनकी परवरिश बेढंगी है, जो कुपोषित हैं, जिनका इलाज छोलाछाप डाक्टर करते हैं, जिनकी स्कूली व्यवस्था में अक्षरज्ञान तक दुर्लभ है । और क्या-क्या बताऊं ?

भारत की जनसंख्या बढ़ जाए तो इंडिया को क्या फर्क पड़ता है ? देश की व्यवस्था तो इंडिया के हाथ में है । इंडिया घाटे में न रहे इसके लिए हर क्षेत्र में दोहरी व्यवस्था अपनाई गयी है अघोषित रूप में । आबादी बढ़ जाए तो उसको थोड़ी परेशानी तो होगी, लेकिन उसे सह लिया जाएगा । असली परेशानी तो भारत को होगी । उसी को तो संसाधनों के अभाव का दंश झेलना होगा । इंडिया उसके लिए क्यों परेशान होवे ?

इसलिए जनसंख्या की बात बेमानी है !

युवा शक्ति – पूंजी?

विश्व के तमाम देशों में आबादी बुढ़ा रही है; यानी उनके यहां आबादी का बृहत्तर हिस्सा प्रौढ़ों-बुजुर्गों का है । इसके विपरीत इंडिया दैट इज भारत में 70 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम उम्र के युवाओं की है ऐसा दावा किया जाता है । कुछ लोगों का मत है ये युवा तो अपने देश की पूंजी हैं । किन युवाओं की बात करते हैं आप ? सड़क पर कूड़ा बीनते हुए, ढाबे पर चायपानी के बर्तन साफ करते हुए, चौराहे पर फल-सब्जी बेचते हुए अथवा ईंटा-गारा ढोते हुए सार्थक स्कूली शिक्षा से वंचित जो बच्चे युवावस्था में पहुंच रहे हों उनको आप पूंजी कहते हैं ? हो सकता है, मेरी समझ निहायत घटिया हो । – योगेन्द्र जोशी

अव्वल दर्जे की आबादी वाला देश हिंदुस्तान, आज नहीं तो कल !

आज विश्व जनसंख्या दिवस है, 11 जुलाई ।

लीजिए जश्न मनाइए, विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या भारत (इंडिया?) की । चौंकिए नहीं ! अगर आंकड़ों पर भरोसा (?) करें तो आज के दिन ऐसा नहीं है, पर कल तो हो ही जायेगा । अभी तक चीन की आबादी ही सबसे अधिक है । लेकिन चीन में जनसंख्या बहुत नियंत्रित जल रही है । अब आप वहां लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के न होने को इस बात के लिए श्रेय दें या वहां के औसत नागरिक की समझदारी को, अथवा दोनों को मिलाकर । अभी चीन की जनसंख्या हम (लगभग 115 करोड़) से करीब 18-20 करोड़ अधिक है । जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार जैसी चल रहीं है वैसी चलती रहे तो इस अंतर को हम बीस-एक साल में पाट लेंगे, इतने में नहीं तो पच्चीस-तीस साल में पाटने में सफल हो ही जायेंगे । नंबर एक बनने से चीन को छोड़ भला कौन रोक सकता है हमें । और वह है कि ‘कॉम्प्टीशन्’ से हटने की सोच रहा है । तब नंबर एक ! कहीं किसी बात में तो नंबर एक होने का गर्व कर सकेंगे ।

लेकिन एक शर्त है, कोई व्यापक प्राकृतिक आपदा देश पर कहर न बरपा डाले या भयंकर संक्रामक रोग अपने पांव न पसार बैठे । यदि अवर्षण जैसे कारणों से अकाल या दुर्भिक्ष की स्थिति व्यापक स्तर पर पैदा हो गई तो हमारी सरकारें उसे संभाल नहीं पायेंगी । कहां से भरेंगे लोगों के पेट ? थोड़ा भोजन भंडार पास में हो भी और कुछ बाहर से आयातित हो भी जाये, तो भी अधिसंख्य ग्रामीणों के जीवन के आधार कृषि और पशुधन को कैसे बचाया जाएगा ? हर बीतते वर्ष के साथ जो हालात देश में बनते हुए नजर आ रहे हैं उसमें हमारे समक्ष गंभीर जलसंकट के आसार दिखाई दे रहे हैं । देश के कई हिस्सों में पानी को लेकर अभी ही प्रदर्शन-दंगे हो रहे हैं, दुर्भिक्ष के समय क्या होगा ? गंभीर रोग-संक्रमण होने पर भी हालात बेकाबू हो सकते हैं । सरकारी अस्पतालों की दशा आज ही दयनीय है । आर्थिक दृष्टि से असमर्थ कितने लोगों को संतोषप्रद इलाज वहां मिलता है ? उन्हें अक्सर निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है । तब व्यापक संक्रमण के फैलने पर हालात बेकाबू हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा । आप या मैं चाहें या न, तब जनसंख्या पर असर पड़ेगा ही । प्रकृति तो अपने तरीके से निबटेगी ही ।

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