लॉकडाउन काल में मन में उपजे छिटपुट छितराए विचार

इस समय हम बेंगलूरु में हैं अपने बेटे के पास। एक मास के नियोजित बेंगलूरु-प्रवास के बाद तारीख २२ मार्च को लौटना था अपने गृहनगर वाराणसी को, किंतु पहले “जनता” कर्फ्यू फिर लॉकडाउन घोषित हो जाने पर यात्रा स्थगित कर दी। इस समय उसका चौथा चरण चल रहा है। बीते २१ ता. को हमारे अनियोजित प्रवास के दो माह हो गये। हवाई सेवा प्रारंभ होने की खबर है लेकिन सर्वत्र भ्रम फैला है।

अब ऊब होने लगी है। वैसे मेरे लिए २४ घंटे व्यस्तता से बिताना कोई कठिन काम नहीं है। परंतु इस अनियोजित प्रवास में मेरी जो आम दैनिक चर्या होती थी उससे वंचित हूं, जिसका एहसास रह-रह के बेचैन करता है। अन्यथा इंटरनेट से प्राप्य विविध जानकारी, लैपटॉप पर भंडारित पाठ्यसामग्री, और मन में उठते विचारों को लेकर ब्लॉग-लेखन यहां भी चल ही रहा है।

हम बहुमंजिली इमारतों और उनके बहु-अपार्टमेंटों के विस्तृत परिसर में रह रहे हैं। बाउंडरी से घिरे परिसर के चारों ओर टहलने में आधे घंटे से अधिक समय लग जाता है। टहलना मेरी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा रहा है। टहलते समय परिसर के परिवेश, परिसर-निवासियों के तौरतरीके, मौजूदा महामारी, संबंधित लॉकडाउन, वैश्विक खबरों आदि को देख तरह-तरह के विचार मन में उठते रहते हैं। उनसे जुड़े परस्पर असंबद्ध, संक्षिप्त, तथा बिखरे विचार इस स्थल पर कलमबद्ध हैं।

 

[१] कष्टकर लॉकडाउन

सोशल मीडिया अर्थात् सामाजिक माध्यम पर ऐसे कई किस्से-कहानियां देखने-सुनने को मिल जा रहे हैं जो दिखाते हैं कि लॉकडाउन काल में लोगों को चौबीसों घंटे घर में रुके रहना कितना बेचैन कर रहा है। मनोवैज्ञानिक यह चिंता व्यक्त करते हैं ऐसी स्थिति में कई-कई दिनों तक पड़े रहना कइयों के लिए मानसिक तनाव एवं तज्जन्य मनोरोग का कारण बन सकता है। कुछ लोग टेलीफोन एवं टीवी पर अवश्य समय गुजारते होंगे। आज के युग में शेष दुनिया से संपर्क साधे रहने के कई अन्य साधन भी उपलब्ध हैं।

मेरे मन में यह सवाल रह-रहकर उठता है कि वे लोग जो किसी न किसी ध्येय की प्राप्ति के लिए जिंदगी को दांव पर लगाते हों, जेल की काल-कोठरी में रहने को भी तैयार हो जाते हों, उनकी सहना शक्ति कितनी अधिक होती होगी? जिस हालात में औसत आदमी पागल हो जाए उसमें भी वे बिना मानसिक संतुलन खोये हफ्तों, महीनों या सालों बिता देते हों यह अविश्वसनीय-सा लगता है। देश के स्वाधीनता संघर्ष में देश के अनेक सुपुत्र इस सामर्थ्य के धनी थे। मुझे वीर सावरकर का नाम याद आता है जिनको अंडमान-नीकोबार – अंग्रेजी-काल में कालापानी – में वर्षों कालकोठरी में गुजारने पड़े। कालापानी अर्थात् देश की मुख्यभूमि से हजारों कि.मी. दूर समुद्रस्थ निर्जन द्वीपीय स्थान। वैसी सामर्थ्य एवं इच्छाशक्ति विरलों को ही मिली रहती है। धन्य हैं वे।

[२] मित्रोँ-परिचितों के निधन का दुर्योग

इसे संयोग, वस्तुतः दुर्योग, ही कहा जाएगा कि लॉकडाउन काल में मुझे नजदीकी मित्रों, सहयोगियों एवं रिश्तेदारों से संबंधित शोकसमाचार सुनने को मिले। हादसे तो होते ही रहते हैं लेकिन जिनकी बात मैं कर रहा हूं उनमें एक मेरी पूर्व-सहयोगी, दो पड़ोसी, और दो निकट संबंधी रहे। गौर करने योग्य बात यह थी वे सभी पहले से ही गंभीर रूप से रुग्ण थे और उनकी लंबे जीवन की आशा नहीं थी। दो तो कैंसर-पीड़ित थे, एक हृदयरोगी, और दो जटिल मिश्रित रोगों से ग्रस्त थे। वे महीनों पूर्व भी दिवंगत हो चुके होते, किंतु संयोग यह रहा कि इसी लॉकडाउन काल में उक्त हादसे हुए।

इन लोगों के दिवंगत होने का जो दुःख उनके पारिवारिक सदस्यों को हुआ उससे अधिक कष्ट इस बात का रहा होगा कि वे उनके अंतिम दर्शन भी नहीं कर सके, क्योंकि दूरस्थ होने और आवागमन के साधन बंद होने के कारण वे मन मसोस कर रह गये। मैं दिवंगत आत्माओं की शांति की प्रार्थना करता हूं, और उनके भाई-बहनों, बेटे-बेटियों आदि निकट संबंधियों के प्रति कष्ट सहने की सामर्थ्य की कामना के साथ सहानुभूति व्यक्त करता हूं। प्रार्थना है कि भविष्य में कोई अनिष्ट समाचार सुनने को न मिले।

[३] भविष्यवाणी के प्रति अविश्वास

मैं ज्योतिष में विश्वास नहीं करता, यद्यपि मेरे खानदान की पूर्ववर्ती पीढ़ियों की जीवनचर्या में पौरोहित्य एवं ज्योतिष शामिल थे। भौतिकी (फिजिक्स) का छात्र, अध्येता और अंततः शोधकर्ता-शिक्षक के तौर पर जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ता गया वैसे-वैसे मेरा विश्वास भविष्यवाचन की सभी विधाओँ-कलाओं से उठता चला गया। भौतिकी में प्रकृति के जिन नियमों का अध्ययन किया जाता है और जिन पर आधुनिक टेक्नॉलॉजी (प्रोद्योगिकी, तकनीकी) आधारित है उनके मद्देनजर मेरे मत में भविष्यवाणी संभव नहीं। किंतु परम आस्था जिसको हो वह तो विश्वास करता रहेगा भले ही विफल भविष्यवाणियों की गठरी ही उसके सामने खोल दी जाए।

इधर वैश्विक कोरोना महामारी को देखकर मेरे मन में भविष्यवाणी के प्रति शंका की बात ताजा हो उठी। जो लोग भविष्यवाणी की किसी भी विधा या कला में विश्वास करते हैं उनको इस प्रश्न का उत्तर देना चाहिए कि किसी भी भविष्यवेत्ता ने इस महामारी की भयावहता की बात विगत समय में – महीनों, सालों पहले – क्यों नहीं की? अब यदि घटना घट चुकने के बाद कोई यह दावा करे कि उसे इसका अंदाजा पहले ही लग चुका था तो उसकी अहमियत नहीं है।

सोचने की बात है कि इस सदी की, और मैं तो कहूंगा सन् १९०० के बाद, वैश्विक स्तर की ऐसी कोई महामारी मानवजाति को नहीं झेलनी पड़ी है। विश्व में आधुनिकतम चिकित्सकीय व्यवस्था के उपलब्ध होने और लॉकडाउन का रास्ता अपनाने के बावजूद संक्रमण के मामले बढ़ते जा रहे हैं और मृतकों की संख्या लाखों में पहुंच चुकी है। क्या यह कोई छोटी-मोटी दुर्घटना है जिसे भविष्यवक्ता जान ही न पाये हों?

दरअसल भावी घटनाओं का ज्ञान संभव नहीं है केवल उनका अनुमान लग सकता है यदि पर्याप्त आधार उपलब्ध हों। ऐसे सुविचारित तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं जिनसे उक्त मत सिद्ध होता हो। मैं वह सब यहां पेश नहीं कर सकता क्योंकि यह विषय विशद तर्क-वितर्क का है। -योगेन्द्र जोशी

लॉकडाउन काल में मन में उपजे छिटपुट छितराए विचार” पर एक विचार

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s