जाने कहां गये साइकिल के वो दिन … बनाम पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमत

जाने कहां गये वे दिन

सड़कों पर जब साइकिलें चलती थीं।

बच्चा हो या बूढ़ा या जवान

सबको साइकिलें प्यारी लगती थीं।

ठीक हाल में रहती थी हरदम

तभी स्कूल-कालेज पहुंचाती थीं।

अस्पताल जाना हो या ऑफिस

साइकिलें सबकी सवारी होती थीं।

पेट्रोल पंप पर लगे अब भीड़

तब हवा भराकर ही वो चलती थीं।

आयेंगे क्या लौट के वो दिन 

साइकिलें जब सड़क पर दिखती थीं।

पेट्रोल-डीज़ल – बढ़ती कीमतें

पिछले कुछ दिनों से पेट्रोल-डीज़ल के दाम प्रायः हर रोज बढ़ रहे हैं और देश की आम जनता बढ़ती कीमत से त्रस्त है। जिसको देखो वह इस मुद्दे पर मोदी सरकार की आलोचना कर रहा है। सरकार कहती कि अंताराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और देश की तेल कंपनियां उसी से मेल खाती कीमतें तय कर रही है। अब खबर यह है कि दाम कुछ घट रहे हैं  कहा यह भी जा रहा है कि यदि पेट्रोल-डीज़ल को भी जीएसटी (GST) के दायरे लाया जाए तो कीमत घट सकती हैं। किंतु इन पर जीएसटी लगाए जाने के पक्ष में कई राज्य नहीं, कारण कि वे इस पर लगे टैक्स से राज्य की कमाई करती हैं। कहा जाता है कि अपने देश में इन पर भांति-भांति के टैक्स भी बहुत हैं जिससे उनके दाम पहले से ही काफी रहे हैं।

जिस भी कारण से पेट्रोल-डीज़ल के मूल्य बढ़ रहे हों, उससे होनी वाली दिक्कत सभी महसूस कर रहे हैं। आज भौतिक प्रगति के उस मुक़ाम पर हम (मानव समाज) पहुंच चुके हैं जहां इन जीवास्म इंधनों के बिना जीवन सुचारु रूप से जीने की सोची नहीं जा सकती है। इन इंधनों पर हमारी निर्भरता समय के साथ कैसे बढ़ती गई है इस बात को समझने के लिए मैं पिछले करीब  46 वर्षों के  अपने निजी अनुभवों का जिक्र करता हूं।

निजी अनुभव

मैंने सन् 1972 में वाराणसी नगर के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) में बतौर एक शिक्षक के कार्य करना शुरू किया था। वे दिन थे जब इस नगर में पेट्रोल/डीज़ल-चालित वाहन आज की तुलना में नगण्य थे। जैसा मुझे अब याद है कि मेरे भौतिकी (फिज़िक्स) विभाग में कुल दो कारें (एक अंबेसेडर और दूसरी फ़िएट) करीब 40 शिक्षकों में से 2 के पास थीं। और शायद तीन या चार स्कूटर भी कुछ के पास थीं। विभाग में एक लेंब्रेटा, एक वेस्पा और एक फैंटाबुलस देखे की याद है मुझे। फैंटाबुलस स्कूटर का नाम कम ही लोगों ने सुना होगा और उसे कभी शायद देखा भी न हो। वह बाज़ार से बहुत पहले ही गायब हो गयी थी। अब तो स्कूटरों की जगह बाइकों ने ले ली है।

उस काल में स्कूटर खरीदना भी आसान नहीं था; कारण दो थे:

(1) पहला कारण यह कि उनकी कीमतें सामान्य संपन्नता वाले व्यक्ति के लिए भी हैसियत के बाहर होती थीं। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि तब मेरा मासिक वेतन लगभग 650 रुपये था जब कि स्कूटर की कीमत करीब 3000 रुपये होती थी। मतलब यह कि 5-6 महीने की कुल तनख्वाह बचाने पर ही मैं स्कूटर खरीद सकता था। आज विश्वविद्यालय का समकक्ष शिक्षक एक महीने के वेतन से ही बाइक/स्कूटी खरीद सकता है।

(2) दूसरा कारण वास्तव में अधिक गंभीर था। कारण यह था कि स्कूटरों-बाइकों-कारों का उत्पादन देश में बहुत कम था, शायद डेड़-दो लाख से अधिक नहीं। पैसा पास होने और शौक होने के वाबजूद लोगों को स्कूटर की उपलब्धता नहीं थी, कारों की तो बात ही छोड़िए।

वह काल था जब मेरे शहर वाराणसी में साइकिल अथवा रिक्शा से आवागमन होता था। शहर में सरकारी बस-सेवा भी उपलब्ध थी लेकिन ऑटोरिक्शा नहीं थे। जनसंख्या भी तब आज की तुलना में एक-तिहाई/एक-चौथाई रही होगी। वह समय था जब वाहनों द्वारा पैदा धूल-धुएं का प्रदूषण खास न था, न उनका शोर-शराबा था, और सड़कों पर न ही आज के जैसा जाम।

1970 के बाद माहौल बदला जिसके तहत कई प्रांतों में स्कूटरों का उत्पादन आरंभ हुआ, नीजी कंपनियों या सरकारी उद्यमों के द्वारा, जैसे उत्तर प्रदेश में तब ‘स्कूटर्ज़ इंडिया’ स्थापना हुई थी जो अब थ्री-व्हीलर वाहन बनाती है। मुझे याद आता है कि उसी दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी ने ‘मारुति’ कार का उद्योग स्थापित किया जो उनकी असामयिक मृत्यु के बाद ‘मारुति-सुजुकी’ उद्योग बना। सीमित संख्या में कारें, जैसे ‘अंबेसडर’, ‘फ़िएट, एवं शायद ‘स्टैंडर्ड’ देश में बन रही थीं, लेकिन उनकी संख्या इस विशाल देश के लिए ’अपर्याप्त’ थीं।

मेरा ख्याल है कि 1990 का दशक आते-आते देश में कार-निर्माण एवं बाइक-निर्माण उद्योग को बढ़ावा मिला। और सड़कों पर कारों-बाइकों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी।

सड़कों पर वाहनों की बढ़ती भीड़

आज स्थिति यह है कि मध्यम वर्ग के अधिकांश लोगों की आमदनी इतनी है कि वे कारें खरीद सकते हैं। इस हेतु बैंकों से भी आमदनी के अनुरूप आसान किस्तों में ऋण या कर्ज मिल जाता है। आज से 45-50 साल पहले तक कर्ज का जुगाड़ करना आसान नहीं था। लोगों की प्राथमिकताएं भी भिन्न थीं। लोग निजी मकान, बाल-बच्चों की पढ़ाई, उनकी शादी-ब्याह के लिए पैसे की बचत की अधिक सोचते थे। आजकल मध्यम वर्ग में परिवार छोटे हो गये हैं और शादी-ब्याह भी विलंब से होते हैं। प्राथमिकताएं भी बदल चुकी हैं। परिणाम यह है कि नयी पीढ़ी के युवा कार-बाइक की व्यवस्था की पहले सोचने लगे हैं और अन्य बातों की चिंता बाद करते हैं।

जहां तक बाइकों का सवाल है इसने साइकिलों की जगह ले ली है। अब समाज के अपेक्षया कमजोर तबके के लोगों के पास भी बाइक दिखने लगी है।

अमेरिका जैसे विकसित देशों में निजी वाहन एक आवश्यकता बन चुकी है। और हमारा देश भी उसी संस्कृति की ओर बढ़ रहा है। गौर करें कि अपने यहां प्रति व्यक्ति औसत आय अमेरिका की तुलना में 4-6 गुना कम है और पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें वहां से अधिक। फिर भी निजी वाहनों पर जोर अधिक है और सरकारें आर्थिक विकास पाने के चक्कर में लोगों को इस दिशा में ही प्रेरित कर रही हैं। वे साइकिलों के प्रयोग को बढ़ावा देने के बजाय बाइकों-कारों को प्रोत्साहित कर रही हैं। निजी वाहन यहां ‘झूठी’ सामाजिक प्रतिष्ठा के द्योतक बन चुके हैं।

आरंभ में मैंने अपने विश्वविद्यालयीय विभाग में कारों/स्कूटरों की नगण्य संख्या की बात कही थी। आज उस विभाग में प्रायः हर शिक्षक के पास कार है। शहर में भी धनाड्यों/नवधनाड्यों की संख्या बहुत बढ़ गई है। अतः सर्वत्र कारों की भीड़ नजर आती है। साइकिलों की जगह बाइकों ने ले ली है। जो लोग पहले साइकिलों से चलते थे वे अब साइकिल चलाना भी भूल चुके हैं और उनके घरों से साइकिलें ग़ायब हो चुकी हैं। पहले 10-15 किमी की दूरी साइकिल से तय करना आम बात थी। लेकिन अब स्कूली बच्चे साइकिल से कम ही जाते हैं और स्कूटर-बाइक-कारों से अधिक!

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि आज के लोग सुविधाभोगी तथा आरामतलब हो चुके हैं। साइकिल एवं रिक्शा आर्थिक रूप से अपेक्षया कमजोर लोगों की चीजें रह गई हैं। अपेक्षया संपन्न वर्ग के लिए आवागमन हेतु पेट्रोल-डीज़ल निहायत जरूरी उपभोक्ता वस्तुएं बन चुके हैं। इनकी कीमतों में तनिक भी उछाल आने पर या इनकी उपलब्धता कम हो जाने पर हाहाकार मच जाता है।

कोई विकल्प नहीं क्या?

हाल के दिनों में जो मूल्यवृद्धि हुई वह परोक्ष रूप से सभी को प्रभावित करती है इसे औरों की तरह मैं भी स्वीकार करता हूं। यातायात, मालढुलाई, कृषिकार्य आदि जैसे सामुदायिक महत्व के कामों की पेट्रोल-डीज़ल पर निर्भरता को नकारा नहीं जा सकता। व्यक्तिगत तौर पर शायद ही कुछ किया जा सकता है। किंतु यह सवाल तो पूछा ही जा सकता है कि हम न्यूनाधिक शारीरिक श्रम करके अपने बजट को नियंत्रित नहीं कर सकते क्या? एक-डेड़ किलोमीटर दूर जाना हो तो कार-बाइकों का सहारा न लेकर पैदल नहीं जा सकते? साइकिल का यथासंभव उपयोग क्या नहीं किया जा सकता? बच्चों को पैदल या साइकिल से स्कूल-कालेज जाने को प्रेरित नहीं कर सकते?

साइकिल चलाने के अपने लाभ हैं: (1) साइकिल खुद में सस्ता वाहन है; (2) शारीरिक श्रम का अवसर प्रदान कर स्वास्थ्य-लाभ देती है; (3) न पेट्रोल का  खर्चा और न ही रखरखाव में कठिनाई; (4) पार्किंग में कम जगह घेरती है; और (4) प्रदूषक न होने के कारण पर्यावरण के लिए हितकर।

निजी वाहनों का एक विकल्प भी है। सरकारें सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था करके भी लोगों के पेट्रोल खर्च को घटा सकती हैं। इस संदर्भ में सिंगापुर का उदाहरण दिया जा सकता है। वहां सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था उत्कृष्ट श्रेणी की बताई जाती है और खर्चीले निजी वाहन रखने की तुलना में सुविधाजनक भी है। दुर्भाग्य से हमारे यहां की व्यवस्था घटिया दर्जे की और अपर्याप्त है। यह व्यवस्था अपेक्षया कम संपन्न लोगों तक सीमित देखी गयी है। इसके प्रयोग में मिथ्या प्रतिष्ठा भी आड़े आती है।

कुल मिलाकर यह कहना चाहूंगा कि हमें सुविधाभोगी न बनकर शारीरिक श्रम की आदत डालनी चाहिए। – योगेन्द्र जोशी

 

Advertisements

कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी की ताजपोशी

 

चुनाव कांग्रेस के पार्टी अध्यक्ष का

समाचार माध्यमों के अनुसार श्री राहुल गांधी ने बीते 16 तारीख (दिसंबर) कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद संभाल लिया है। मेरी समझ से यह औपचारिकता 19 तारीख होनी चाहिए थी।

अध्यक्ष पद के चुनाव की पूरी प्रक्रिया इस बार जोर-शोर से प्रकाशित हुई और समाचार माध्यमों पर चर्चा का विषय बनी। कार्यक्रम के अनुसार इस माह (दिसंबर) की 1ली तारीख चुनाव की विज्ञप्ति जारी की गई;  नामांकन एवं उनकी जांच 5 तारीख और नाम-वापसी की तारीख 11 रखी गई। मतदान 16 को होना था जिसकी आश्यकता नहीं रह गई। चुनाव परिणाम 19 दिसंबर घोषित होने हैं जिस दिन राहुल गांधी को औपचारिक तौर पर पार्टी का नवनिर्वाचित अध्यक्ष घोषित कर दिया जाना था। (देखें इंडियन एक्सप्रैस समाचार)

ध्यान दें कि इस बार नेहरू-गांधी परिवार के इस वारिस की ताजपोशी के लिए अध्यक्ष पद का चुनाव निर्धारित प्रक्रियानुसार किया गया है। मेरी जानकारी में लंबे अरसे से पार्टी-अध्यक्ष चुने जाने की प्रक्रिया नहीं अपनाई जा रही थी। राहुल के चुनाव की पूरी प्रक्रिया की बात मीडिया में इतनी क्यों छाई रही यह मेरी समझ से बाहर है। क्या कांग्रेस यह दिखाना चाहती है कि वह पूरी लोकतांत्रिक पद्धति से अध्यक्ष का चुनाव करती है? पहले भी यही गंभीरता दिखाई गई है क्या?

इस विषय पर आगे कुछ कहने से पहले पार्टी-संविधान के अनुसार क्या होना चाहिए इसकी चर्चा कर लूं। मेरी जानकारी हिन्दुस्तान अखबार

में छपी खबर पर आधारित है। पार्टी की शीर्ष समिति, कांग्रेस वर्किंग कमिटी, चुनाव का कार्यक्रम निर्धारित करती है। 10 या अधिक पार्टी-प्रतिनिधि इच्छुक प्रत्याशी का नामांकन करते हैं। राज्यों की वर्किंग कमिटियों के सदस्य प्रतिनिधि होते हैं। नामांकन की अंतिम तारीख के बाद कोई भी प्रत्याशी 7 दिनों के भीतर  नाम वापस ले सकता है। उसके बाद नियत तारीख पर आवश्यक होने पर मतदान होता है। 50% से अधिक मत पाने वाला निर्वाचित अध्यक्ष कहलाता है जो अगले अधिवेशन (जब भी हो) की अध्यक्षता करता है जिसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। आवश्यक होने पर मतों में व्यक्त दूसरी वरीयता को भी शामिल किया जाता है। 4 दशक पूर्व तक यह  मात्र 1 वर्ष का होता था।

कांग्रेस संविधान की एक बात महत्वपूर्ण है: कांग्रेस वर्किंग कमिटी को यह अधिकार है कि समय पर चुनाव न करवा पाने पर वह अनंतिम (provisional) या अस्थाई तौर पर किसी को भी अध्यक्ष पद पर नियुक्त कर सकती है। मैं समझता हूं कि यह प्राविधान कुछ विशेष परिस्थितियों के लिए स्वीकारा गया होगा। लेकिन इसका भरपूर – और मेरी दृष्टि में बेजा – इस्तेमाल नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के लिए किया गया है। इसी प्राविधान के तहत ही इंदिरा, राजीव (जब तक ये दो जीवित रहे), और सोनिया गांधी लंबे अरसे तक पार्टी अध्यक्ष बने रहे। सोनिया गांधी तो लगातार 19 वर्षों तक शीर्ष पद पर बनी रहीं। अवश्य ही सन् 2000 में कांग्रेस नेता जितेन्द्र प्रसाद उनके विरुद्ध चुनाव लड़े परंतु उन्हें  बहुत बुरी हार मिली।

विगत काल के कांग्रेस अध्य्क्ष

इस आलेख के अंत में सन् 1885 से अब तक के कांग्रेस अध्यक्षों की सूची शामिल की गई है। इस विषय की जानकारी ऑल इंडिया कांग्रेसआईएनसी (इंडियन नैशनल कांग्रेस), एवं विकीपीडिया आदि की वेबसाइटों पर मिल सकती है।

सूची में लाल रंग एवं कोष्टक में अंकित संख्या कोई व्यक्ति कितनी बार अध्यक्ष चुना गया इसकी जानकारी देता है। गौर से देखने पर कुछ बातें साफ नजर आएंगी। स्वातंत्र्य पूर्व अध्यक्षों का कार्यकाल एक वर्ष का होता था। विशेष परिस्थितियों में कार्यकाल कुछ माह का या साल भर से भी अधिक का होता होगा ऐसा मेरा सोचना है। उदाहरण के तौर पर 1918 में आयोजित विशेष अधिवेशन (बम्बई) की अध्यक्षता सैयद हसन इमाम (Syed Hasan Imam) ने की थी और उसी वर्ष के दूसरे अधिवेशन में मदन मोहन मालवीय (Madan Mohan Malaviyav) ने अध्यक्षता की।

दी गई सूची में उन कांग्रेस नेताओं के नाम लाल रंग से इंगित हैं जो एक से अधिक बार अध्यक्ष बने। स्वतंत्रता पूर्व भारत में दादाभाई नरौजी,  मदन मोहन मालवीय, जवाहर लाल नेहरू अधिकतम 3 बार अध्यक्ष बने। स्वतंत्रता के बाद भी नेहरूजी 3 बार (लगातार) अध्यक्ष बने थे। इस प्रकार नेहरूजी कुल 6 बार अध्यक्ष बने। अन्यथा सूची से यह ज्ञात होता है कि धेबर महोदय 5 बार अध्यक्ष चुने गए। धेबर को छोड़ कोई भी इस पद पर लगातार 5 साल से अधिक नहीं रहा।

कांग्रेस के अध्यक्षों की एक वर्ष के कार्यकाल की परंपरा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी कुछ समय तक चलती रही। लेकिन जब इंदिरा गांधी कांग्रेस राजनीति में ताकतबर नेता के तौर पर उभरीं और 1966 में देश की प्रधानमंत्री बनी तो यह सिलसिला गड़बड़ाने लगा। सन्‍ 1969 से अध्यक्ष का कार्यकाल 3-3 वर्ष का देखने को मिलता है।

पंचवर्षीय कार्यकाल

कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष का कार्यकाल आजकल 5 वर्ष का है। मेरा ख्याल है कि यह तबदीली इंदिरा गांधी के समय (1978) से हो गया था। वे 1978 में और फिर 1983 में अध्यक्ष बनी। लेकिन 1984  में उनकी हत्या हो गई। तत्पश्चात्‍ कुछ माह के लिए अनंतिम तौर पर कोई अध्यक्ष रहा या नहीं मुझे पता नहीं। अवश्य ही वरिष्ठतम उपाध्यक्ष ने पद संभाला होगा। बाद में 1985 के बंबई अधिवेशन में राजीव गांधी अध्यक्ष चुने गए, लेकिन उनकी हत्या (मई 21, 1991) के बाद यह पद कुछ समय खाली रहा।

इंदिरा गांधी के काल में ही यह सुनिश्चित हो गया था कि अध्यक्ष पद नेहरू-गांधी परिवार में ही रहना है। कमोबेश सभी कांग्रेस-जनों को यह स्वीकार्य था। यदि राजीव गांधी जीवित होते तो शायद आज भी वही पार्टी अध्यक्ष होते, या अपने जीवन काल ही में वे राहुल को गद्दी सोंप दिए होते।

राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस में उक्त परिवार का कोई भी सदस्य नहीं रह गया था। कांग्रेस दल में एक प्रकार की रिक्तता छा गई। यह मौका था जब कांग्रेसी नेहरू-गांधी परिवार के आभामंडल से बाहर निकल सकते थे। ऐसा हुआ भी लेकिन प्रयोग सफल नहीं हुआ। 1992 में पी.वी. नरसिम्हाराव अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने सत्ता भी संभाली। 5 वर्ष के कार्यकाल के दौरान तमाम आरोप लगे। विपक्षियों का विरोध तो उन्हें झेलना पड़ा, उसके अलावा कांग्रेस पार्टी के भीतर असंतोष भी पनपने लगा।

सन्‍ 1996 के आम चुनाव में कांग्रेस को हार का मुख देखना पड़ा। विपक्षी दलों (भाजपा को छोड़कर) के गठबंधन ने सरकार बनाई जो लगभग दो वर्षों के भीतर ही अपने अंतर्विरोधों के चलते बिखर गई। 1997 में वरिष्ठ नेता सीताराम केसरी ने अध्यक्ष पद संभाला किंतु उसके पहले के 5-6 सालों के अंतराल में कांग्रेस के भीतर यह विचार जड़ें जमा चुका था कि नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य के बिना पार्टी का उद्धार कोई नहीं कर सकता। अतः सोनिया गांधी को मनाया जाने लगा। कांग्रेस जनों के दबाव या प्रार्थना के बावजूद वह लंबे समय तक राजनीति से दूर रह रही थीं, किंतु अंततः 1997 के अंत आते-आते उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार कर ली और लगभग दो माह बाद केसरी को पद से हटाकर 1998 के आरंभ में उन्हें अध्यक्ष की गद्दी सोंप दी गई। तब से वह अभी तक (19 वर्ष) इस पर काबिज हैं, हालांकि 2000 में जितेन्द्र प्रसाद ने उन्हें चुनौती दी थी।

वर्तमान कांग्रेस की राजनैतिक संस्कृति

विगत कुछ दशकों में स्पष्टतः परिभाषित एवं मीडिया में प्रकाशित चुनाव-प्रक्रिया कितनी बार अपनाई गई यह मैं नहीं जानता। अगर अपनाई भी गई हो तो वह खानापूर्ति से अधिक कुछ भी नहीं रही होगी। हर बार मीडिया में खबर छप जाती थी कि अमुक व्यक्ति (आवश्यक रूप से नेहरू परिवार का सदस्य) पार्टी-अध्यक्ष चुन लिया गया है।

लेकिन इस बार इतना ढिंढोरा क्यों पीटा गया? इसका कारण है।

पिछले कुछ वर्षों से सोनिया गांधी अस्वस्थ चल रही हैं। वे अध्यक्ष के कार्यभार से मुक्त होना चाहती थीं। अपनी विरासत किसे सोंपें? राहुल गांधी से बेहतर (उनके लिए) कौन वारिस हो सकता हैं? यों पुत्री प्रियंका (वाड्रा) को अधिक कांग्रेसी चाहते हैं ऐसा मालूम पड़ता है। कदाचित् पुत्रमोह उन्हें राहुल को पार्टी के शीर्ष पद पर स्थापित करने को प्रेरित करता है। यों भी गांधी के नाम से प्रियंका नहीं जानी जाएंगी जो एक प्रकार से दिक्कत की बात हो सकती है। राहुल को तैयार करने के लिए सोनिया गांधी ने उन्हें अपने अधिकार कुछ हद तक सोंप दिए थे। राहुल कहने को उपाध्यक्ष थे लेकिन अघोषित तौर पर कार्यकारी अध्यक्ष बने हुए थे।

कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी से कहीं अधिक वरिष्ठ एवं अनुभवी नेता रहे हैं लेकिन उनमें से किसी को भी वे विशेषाधिकार प्राप्त नहीं हो सके जो राहुल गांधी को प्राप्त रहे हैं। दरअसल इंदिरा गांधी के समय ही यह परंपरा स्थापित हो गई थी कि अध्यक्ष का पद नेहरू-गांधी परिवार के लिए आरक्षित रहेगा। राहुल गांधी को एक कार्यकर्ता की हैसियत से कोई अनुभव एवं योग्यता प्राप्त न होने बावजूद उन्हें 2004 में सीधे महासचिव और तत्पश्चात् 2013 में (वरिष्ठ्तम?) उपाध्यक्ष बना दिया गया। कांग्रेसजन बंधुआ नेताओं की तरह सब हंसते हुए, खुशी मनाते हुए, स्वीकार करते आ रहे हैं (बंधुआ नेता – बंधुआ मजदूरों के माफिक)।

कांग्रसजनों का तर्क सदैव यह रहा है: “नेहरू-गांधी परिवार ने इस देश के लिए जो त्याग किया है, बलिदान दिया है, उससे किसी और की तुलना नहीं की जा सकती। इसलिए कांग्रेस की हो बागडोर या देश की वह तो नेहरू-गांधी परिवार के हाथों में ही होनी चाहिए।”

यह तर्क (या कुतर्क?) यह मान के चलता है कि पुरखों के योगदानों का फल उनकी आने वाली पीढ़ियों को मिलते रहना चाहिए। यह मान भी लें कि उक्त परिवार के सदस्यों का योगदान अविस्मरणीय रहा है, लेकिन क्या अन्य परिवारों ने देश के लिए बलिदान नहीं दिए? उनमें से कितनों को कांग्रेसियों ने महत्व दिया है? कहां हैं वे और क्या हैसियत है उनकी आज के कांग्रेस दल में? उसी नेहरू-गांधी परिवार के तो मेनका गांधी और वरुण गांधी भी हैं। उनको उस परिवार के योगदानों का श्रेय और लाभ क्यों नहीं दिया जा रहा है?

राहुल की ताजपोशी : चुनाव का दिखावा?

राहुल की ताजपोशी की बात लंबे अरसे से चल रही थी। विगत कुछ समय से यह सुनने में आता रहा है कि राहुल अमुक तारीख तक अध्यक्ष पद ग्रहण कर लेंगे; और वह तारीख टलती जा रही थी। राहुल का कहना था, “अभी मुझे पार्टी के बारे में बहुत कुछ समझना है, बहुत कुछ सीखना है।” कांग्रेसजनों ने तो मन बना ही रखा था कि जब राहुल तैयार हो जाएंगे और चाहेंगे उनको अध्यक्ष पद सोंप दिया जाएगा। वह घड़ी आ गई, राहुल ने हांमी भर दी, और कांग्रेसियों की ख्वाहिश पूरी हो गई।

पूरा देश जानता था जब भी होगा राहुल को ही अध्यक्ष बनना हैं। तब निर्वाचन की प्रक्रिया का दिखावा क्यों? उसका भी कारण है। राहुल कहते आ रहे थे कि वह पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र स्थापित करेंगे और पार्टी के संविधान के अनुसार कार्य निबटाएंगे। क्या अभी तक आंतरिक लोकतंत्र नहीं था?

अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया दिखावा भर है यह बात शहज़ाद पूनावाला की बातों से स्पष्ट है। शहज़ाद कांग्रेस का सदस्य और महाराष्ट्र राज्य में पार्टी-सचिव हैं। अभी तक उन्होंने राहुल के लिए ही कार्य किया है। लेकिन इस बार उन्हें लगा कि कांग्रेस की संस्कृति के अनुसार कोई भी अन्य कांग्रेसी अध्यक्ष पद के लिए नामांकन कर ही नहीं सकता। हर कोई यह मान के चलता है कि जब तक नेहरू-गांधी परिवार का सदस्य उपलब्ध हो किसी और को चुनाव लड़ने की सोचनी ही नहीं चाहिए। जब स्थिति इतनी स्पष्ट थी तो चुनाव का ढोंग रचने की आवश्यकता ही क्या थी? और यदि लोकतांत्रिकता का प्रदर्शन करना ही था तो किसी और को भी नामांकन के लिए प्रेरित करना चहिए था – दिखावे के लिए ही सही।

कांग्रेसजनों का नेहरू-गांधी परिवार के प्रति कितनी अंधभक्ति है इसका ज्वलंत उदाहरण शहज़ाद के बड़े भाई तहसीन पूनावाला (वे भी कांग्रेस सदस्य) ने पेश किया है। उन्होंने और उनके परिवार ने शहजाद से परिवारिक नाते ही तोड़ दिए। “तुम्हारी ये हिम्मत कैसे हो गई?”

खैर, “कोई अध्यक्ष होय हमें का हानि!”

भारतीय यानी इंडियन लोकतंत्र

भारत यानी इंडिया विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लेकिन यह महान् लोकतंत्र नहीं है। बड़ा होना इसकी उपलब्धि नहीं बल्कि विवशता है। जब आबादी अमेरिका से करीब 4 गुना हो तब बड़ा तो होना ही है। किंतु महान् बनने के लिए आबादी नहीं लोकतंत्र की गुणवत्ता माने रखती है। अपनी उम्र के 70 वर्ष के पड़ाव पर यही कह सकता हूं कि समय के साथ लोकतंत्र में गिरावट ही आई है। तब महानता के लक्षण कहां?  देश में अनेक राजनैतिक दल चुनाव लड़ते हैं। उनमें से कितनों में आंतरिक लोकतंत्र है? कदाचित् 10% में भी नहीं। सभी में सामन्ती व्यवस्था है। कांग्रेस ने भी उसी व्यवस्था को अपना लिया है।

असल में कांग्रेस पार्टी में यह धारणा घर गई है कि इसके बिखराव को केवल नेहरू-गांधी परिवार ही रोक सकता है। – योगेन्द्र जोशी

List of Past Presidents of Indian National Congress (INC, Congress in short)

 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (संक्षेप में कांग्रेस) के विगत-काल के अध्यक्षों की सूची

 

स्वातंत्र्यपूर्व भारत Pre-Independence India
1885 (Bombay बम्बई) Womesh Chandra Bonnerjee वोमेश चन्द्र बनर्जी (1)
1886 (Calcutta कलकत्ता) Dadabhai Naoroji दादाभाई नरौजी (1)
1887(Madras मद्रास) Badruddin Tyabji बदरुद्दीन तैयबजी
1888 (Allahabad इलाहाबाद) George Yule ज्यॉर्ज यूल
1889 (Bombay बम्बई) William Wedderburn विलिअम वेडरबर्न
1890 (Calcutta कलकत्ता) Pherozeshah Mehta फ़िरोज़शाह मेहता
1891 (Nagpur नागपुर) P. Ananda Charlu पी. आनन्द चार्लू
1892 (Allahabad इलाहाबाद) Womesh Chandra Bonnerjee वोमेश चन्द्र बनर्जी (2)
1893 (Lahore लाहौर) Dadabhai Naoroji दादाभाई नरौजी (2)
1894 (Madras मद्रास) Alfred Webb आलफ़्रेड वेब
1895 (Poona पूना ) Surendranath Banerjea  सुरेन्द्र नाथ बनर्जी
1896 (Calcutta कलकत्ता) Rahimtulla M. Sayani   रहीमतुल्ला एम. सयानी
1897 (Amraoti अमरावती) C. Sankaran Nair सी. शंकरन नायर
1898 (Madras, मद्रास) Ananda Mohan Bose आनंद मोहन बोस
1899 (Lucknow, लखनऊ) Romesh Chunder Dutt रमेश चंद्र दत्त
1900 (Lahore लाहौर) Narayan Ganesh Chandavarkar नारायण गणेश चंदावरकर
1901 (Calcutta, कलकत्ता) Dinshaw Edulji Wacha  दिनशॉ एदुलजी वाचा
1902 (Ahmedabad अहमदाबाद) Surendranath Banerjea सुरेन्द्र नाथ बनर्जी
1903 (Madras, मद्रास) Lalmohan Ghosh  लालमोहन घोष
1904 (Bombay, बम्बई) Henry Cotton हेनरी कॉटन
1905 (Benares बनारस) Gopal Krishna Gokhale गोपाल कृष्ण गोखले
1906 (Calcutta कलकत्ता) Dadabhai Naoroji दादाभाई नरौजी (3)
1907 (Surat सूरत) Rashbihari Ghosh  राशबिहारी घोष (1)
1908 (Madras मद्रास) Rashbihari Ghosh  राशबिहारी घोष (2)
1909 (Lahore लाहौर) Madan Mohan Malaviya मदन मोहन मालवीय (1)
1910 (Allahabad इलाहाबाद) William Wedderburn  विलिअम वेडरबर्न
1911 (Calcutta कलकत्ता) Bishan Narayan Dar  बिशन नारायन डार
1912 (Bankipur बांकीपुर) Rao Bahadur Raghunath Narasinha Mudholkar

राव बहादुर रघुनाथ नरसिंह मुधोलकर

1913 (Karachi करांची) Nawab Syed Mohammad Bahadur

नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर

1914 (Madras मद्रास) Bhupendra Nath Bose  भूपेन्द्र नाथ बोस
1915 (Bombay, बम्बई) Satyendra Prasanna Sinha सत्येन्द्र प्रसन्ना सिंहा
1916 (Lucknow लखनऊ) Ambica Charan Mazumdar अंबिका चरन मजुमदार
1917 (Calcutta, कलकत्ता) Annie Besant  एनी बेसंट
1918 (Bombay, बम्बई) Syed Hasan Imam सैयद हसन इमाम
1918 (Delhi दिल्ली) Madan Mohan Malaviyav मदन मोहन मालवीय (2)
1919 (Amritsar अमृतसर) Motilal Nehru  मोतीलाल नेहरू (1)
1920 (Calcutta, कलकत्ता) Lala Lajpat Rai  लाला लाजपत राय
1920 (Nagpur नागपुर ) C. Vijayaraghavachariar  सी. विजय राघवाचारियार
1921 (Ahmedabad अहमदाबाद) Hakim Ajmal Khan  हकीम अजमल ख़ान
1922 (Gaya गया) Chittaranjan Das  चित्तरंजन दास
1923 (Cocanada काकीनाड) Maulana Mohammad Ali  मौलाना मुहम्मद अली
1923 (Delhi दिल्ली) Maulana Abul Kalam Azad  मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (1)
1924 (Belgaum बेलगाम) Mohandas Karamchand Gandhi  मोहनदास करमचंद गांधी
1925 (Kanpur कानपुर) Sarojini Naidu  सरोजिनी नायडू
1926 (Gauhati गुवाहाटी S. Srinivasa Iyengar एस. श्रीनिवास आयंगर
1927 (Madras मद्रास) Mukhtar Ahmad Ansari  मुख़्तार अहमद अंसारी
1928 (Calcutta, कलकत्ता) Motilal Nehru  मोतीलाल नेहरू (2)
1929 (Lahore लाहौर) Jawaharlal Nehru  जवाहर लाल नेहरू (1)
1931 (Karachi करांची) Vallabhbhai Patel  बल्लभभाई पटेल
1932 (Delhi दिल्ली) Madan Mohan Malaviya मदन मोहन मालवीय (3)
1933 (Calcutta, कलकत्ता) Nellie Sen Gupta नेली सेन गुप्ता
1934 (Bombay, बम्बई) Rajendra Prasad राजेन्द्र प्रसाद
1935 (Lucknow लखनऊ) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (2)
1936 (Faizpur फ़ैज़पुर) Jawaharlal Nehru  जवाहर लाल नेहरू (3)
1938 (Haripura हरीपुरा) Subhas Chandra Bose सुभाष चंद्र बोस (1)
1939 (Tripuri त्रिपुरी) Subhas Chandra Bose सुभाष चंद्र बोस (2)
1940 (Ramgarh रामगढ़) Maulana Abul Kalam Azad मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (2)
1946 (Meerut मेरठ) J. B. Kripalani  जे. बी. कृपलानी
स्वातंत्र्योत्तर भारत Post-Independence India
1948 (Jaipur जयपुर) Pattabhi Sitaramayya  पट्टाभि सीतारमैय्या
1950 (Nasik नासिक) Purshottam Das Tandon  पुरुषोत्तम दास टंडन
1951 (New Delhi नई दिल्ली) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (4)
1953 (Hyderabad हैदराबाद) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (5)
1954 (Kalyani कल्याणी) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (6)
1955 (Avadi अवादी) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (1)
1956 (Amritsar अमृतसर) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (2)
1957 (Indore इंदौर) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (3)
1958 (Gauhati गुवाहाटी) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (4)
1959 (Nagpur नागपुर) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (5)
1960 (Bangalore बंगलौर) Neelam Sanjeeva Reddy  नीलम संजीव रेड्डी (1)
1961 (Bhavnagar भावनगर) Neelam Sanjeeva Reddy  नीलम संजीव रेड्डी (2)
1962 (Patna पटना) Neelam Sanjeeva Reddy नीलम संजीव रेड्डी (3)
1964 (Bhubaneswar भुवनेश्वर) K. Kamaraj के. कामराज (1)
1965 (Durgapur दुर्गापुर) K. Kamaraj के. कामराज (2)
1966 (Jaipur जयपुर) K. Kamaraj के. कामराज (3)
1968 (Hyderabad हैदराबाद) S. Nijalingappa एस. निजलिंगप्पा (1)
1969 (Faridabad फ़रीदाबाद) S. Nijalingappa एस. निजलिंगप्पा (2)
1969 (Bombay बम्बई) Jagjivan Ram  जगजीवन राम
1972 (Calcutta कलकत्ता) Shankar Dayal Sharma  शंकर दयाल शर्मा
1975 (Chandigarh चंडीगढ़) Dev Kanta Borooah देवकांत बरुआ
1978 (New Delhi नई दिल्ली) Indira Gandhi इंदिरा गांधी (1)
1983 (Calcutta, कलकत्ता) Indira Gandhi इंदिरा गांधी (2)
1985 (Bombay बम्बई) Rajiv Gandhi राजीव गांधी
1992 (Tirupati तिरुपति) P. V. Narasimha  Rao पी.वी. नरसिम्हाराव
1997 (Calcutta कलकत्ता) Sitaram Kesri सीताराम केसरी
1998 (New Delhi नई दिल्ली) Sonia Gandhi सोनिया गांधी

 

11 जुलाई, विश्व जनसंख्या दिवस – भारत की विकट समस्या, जनसंख्या

विश्व जनसंख्या दिवस – उद्देश्य

आज, जुलाई 11, विश्व जनसंख्या दिवस है। क्या भारत के संदर्भ में इसकी कोई अहमियत है? मेरी नजर में नही!

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1989 में 11 जुलाई का दिन “विश्व जनसंख्या दिवस” के तौर पर घोषित किया था। असल में 1987 की इसी तारीख पर विश्व जनसंख्या उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित अनुमान के अनुसार 5 अरब को पार कर गई थी। संयुक्त राष्ट्र को तब लगा कि दुनिया की आबादी को नियंत्रित किया जाना चाहिए, और  इसके लिए सभी को जागरूक किया जाना चाहिए। उस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए दो वर्ष बाद इस दिन को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

उक्त जनसंख्या दिवस का उद्देश्य है सभी देशों के नागरिकों को बढ़ती आबादी से उत्पन्न खतरों के प्रति जागरूक करना और उन्हें आबादी नियंत्रण के प्रति प्रेरित करना। क्या भारत की सरकारें, यहां की संस्थाएं और सामान्य जन इस समस्या को कोई अहमियत दे पाए हैं? उत्तर नहीं में ही मिलता है।

भारत – अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि

ध्यान दें इस दिवस को अब 28 वर्ष हो रहे हैं। यह अंतराल छोटा नहीं; इस बीच पूरी एक नयी पीढ़ी पैदा हो चुकी है और उसके बाद की पीढ़ी पैदा होकर शैशवावस्था में आ चुकी है। यदि देश में जनसंख्या को लेकर कुछ भी सार्थक एवं कारगर किया जा रहा होता तो इन लगभग 3 दशकों में उल्लेखनीय परिणाम देखने को मिल चुके होते। जनसंख्या उसी रफ्तार से या थोड़ा-सा कम रफ्तार से अभी भी बढ़ रही है।  अपने देश की आबादी किस कदर बढ़ती गई है इसे आगे प्रस्तुत तालिका से समझा सकता है:

 वर्ष जनसंख्या

 करोड़ों में

  प्रतिशत वृद्धि

  प्रति 10-वर्ष

 जनसंख्या प्रतिशत

  1951 के सापेक्ष

1951 36.01 —– 100
1961 43.92 21.64 122
1971 54.81 24.80 152
1981 68.33 24.66 190
1991 84.64 23.87 235
2001 102.37 21.54 284
2011 121.02 17.64 336

1 करोड़  = 10 मिलियन  = 100 लाख

Source:  http://www.iipsenvis.nic.in/Database/Population_4074.aspx

गौर करें कि 1991 से 2011 के 20 वर्षों के अंतराल में ही देश में करीब 37 करोड़ लोग जुड़ गये और आबादी 1.43 गुना हो गई। और चिंता की बात यह है आज 1917 में अनुमानित आबादी 132-134 करोड़ बताई जा रही है। क्या सीखा देश ने इस जनसंख्या दिवस से? कौन-से कारगर तरीके अपनाए देश ने आबादी नियंत्रित करने के लिए?

मैं पाठकों का ध्यान इस तथ्य की ओर खींचता हूं कि चीन ने 1979 में एक-संतान की कानूनी नीति अपनाई। तब उसकी आबादी लगभग 98 करोड़ थी (भारत की करीब 68 करोड़ उसके सापेक्ष) आज वह 140 करोड़ आंकी जा रही है।

तस्वीर वर्ष 2024 की

हाल में संयुक्त राष्ट्र की विश्व जनसंख्या संबंधी रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसके अनुसार अगले सात वर्षों बाद 2024 में भारत की आबादी चीन के बराबर, फि र उसके अधिक हो जायेगी। यह अनुमान इन आंकड़ों पर आधारित है कि भारत की मौजूदा आबादी करीब 134 करोड़ और वृद्धि दर 1.1% प्रति वर्ष है जब की चीन की आबादी 140 करोड़ और वृद्धि दर मात्र 0.4 % प्रतिवेर्ष है।

इतना ही नहीं, अनुमान यह भी है कि 2030 आते-आते चीन की आबादी करीब-करीब स्थिर हो जायेगी और बाद के वर्षो में उसमें गिरावट भी आ सकती है। इसके विपरीत अपने देश की आबादी 2030 तक 150 करोड़  और बढ़ते हुए 2050 में 166 करोड़ हो जायेगी। उसके बाद उसके स्थिर होने की संभावना रहेगी।

मैं सोचता था कि देश के बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन, सरकारी तंत्र एवं शासन चलाने वाले राजनेता उक्त समाचार से चिंतित होंगे, मुद्दे को लेकर संजीदा होते हुए आम जन को सार्थक संदेश देंगे, और इस दिशा में कारगर कदम उठाने की बात करेंगे। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। किसी भी टीवी चैनल पर कोई बहस चली हो ऐसा भी शायद नहीं हुआ।

आबादी को लेकर कोई भी गंभीर नहीं जब कि यह देश के सामने खड़ी विकट समस्या है जिससे अन्य तमाम समस्याएं पैदा हो रही हैं।

1970 का दुर्भाग्यपूर्ण दशक

बढ़ती आबादी को लेकर जो उदासीनता देखने में आ रही है उसका मूल मेरे मत में 1970 का वह दशक है जिसमें आपातकाल लगा था, इंदिरा गांधी के तथाकथित अधिनायकवादी रवैये के विरुद्ध जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनांदोलन चला था, पहली बार कांग्रेस सत्ताच्युत हुई थी, विपक्षी दलों ने विलय करके जनता पार्टी बनाई और सत्तासीन हुए थे, आदि-आदि। इसी दशक में संजय गांधी (इंदिराजी के छोटे पुत्र) एक असंवैधानिक ताकत के तौर पर उभरे।

बीसवीं सदी के साठ-सत्तर के दशकों में भारत ने परिवार नियोजन की नीति अपनाई थी। मुझे उस समय के “हम दो हमारे दो” के नारे और परिवार नियोजन के कार्यक्रम का द्योतक चिह्न “लाल त्रिकोण” की याद अच्छी तरह है।

संजय गांधी को परिवार नियोजन की योजना बहुत भाई। उनका यह सोचना कि आबादी को बढ़ते देने से देश का दीर्घकालिक अहित निश्चित है। कार्यक्रम तो चल ही रहा था, उसको गति देने के लिए उन्होंने सत्ता से अपनी निकटता का भरपूर किंतु अनुचित लाभ उठाना आरंभ किया। उनके चाटुकारों की कोई कमी नहीं थी और जब वे जोर-जबरदस्ती परिवार नियोजन थोपने लगे तो परिणाम घातक हो गये। मैं उस समय की स्थिति का विवरण नहीं दे सकता। लेकिन वस्तुस्थिति का अंदाजा इसी उदाहरण से लगाया जा सकता है कि अस्पताल कर्मचारियों को नसबंदी के मामले खोज-खोजकर लाना आवश्यक हो गया, अन्यथा तनख्वाह/नौकरी पर आंच आ सकती थी। तब के जनांदोलन में संजय गांधी भी एक कारण बने।

तब परिवार नियोजन कार्यक्रम पर ऐसा ग्रहण लगा कि आज तक उसका कुफल देश को भुगतना पड़ रहा है। परिवार नियोजन ऐसा शब्द बन गया कि राजनेता उसे मुंह से निकालने से भी कतराने लगे। जनसंख्या वृद्धि रोकने की कवायत राजनीति से गायब हो गई। परिणाम?

आज की हमारी आबादी (132+ करोड़) तब (1974-75)  की आबादी (60-62 करोड़) के दोगुने से अधिक हो चुकी है। और जल्दी ही हम चीन को पछाड़ने वाले हैं। इस संभावना पर खुश होवें कि अपना माथा पीटें?

एक अन्य संबंधित समाचार मुझे पढ़ने को मिला (देखें: टाइम्ज़ अव् इंडिया), जिसके अनुसार 2050 तक भारत की मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की मुस्लिम आबादी से अधिक हो जायेगी। अभी सर्वाधिक मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की है, भारत से कुछ करोड़ अधिक। इस विषय की अधिक चर्चा मैं नहीं कर रहा हूं।

कई राज्यों का बेहतर कार्य

वे क्या कारण थे कि राजनेताओं ने बढ़ती आबादी पर खुलकर चर्चा नहीं की? ऐसा तो नहीं कि “आबादी नियंत्रण की कोशिश करने पर जनता कहीं नाखुश न हो जाए और हमें वोट न दें” यह विचार उनके दिमाग में गहरे घुस गया हो? या वे मुद्दे के प्रति एकदम उदासीन हो गए हों। कारण कुछ भी हों देश को बढ़ती आबादी का दंश तो झेलना ही पड़ रहा है।

फिर भी कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में रुचि ली और उसके परिणाम उन्हें मिले भी हैं।

यहां उल्लेख कर दूं कि विषय के जानकारों के अनुसार जनसंख्या के स्थिरता (वृद्धि दर शून्य) के लिए प्रजनन दर करीब 2.1 प्रति स्त्री होनी चहिए। इससे कम पर आबादी घटने लगती है। मैं कुछ गिने-चुने राज्यों के प्रजनन दर के आंकड़े (वर्ष 2016) प्रस्तुत करता हूं (स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_states_ranking_by_fertility_rate):

1) सिक्किम – 1.2 !

2) केरला, पंजाब – 1.6

3) गोवा, तमिलनाडु, त्रिपुरा, दिल्ली, पुद्दुचेरी = 1.7

4) आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल = 1.8

5) हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र = 1.9

6) गुजरात, जम्मू कश्मीर = 2.0

7) अरुणाचल, उत्तराखंड, ओडीसा, हरयाणा = 2.1 

8) आसाम, छत्तीसगढ़ = 2.2

9) मध्य प्रदेश, मिजोरम = 2.3

10) राजस्थान = 2.4

11) झारखंड, मणिपुर = 2.6

12) उत्तर प्रदेश, ) नगालैंड = 2.7 ?

13) मेघालय = 3.0 ?

14) बिहार = 3.4 ?

पूरे देश का औसत प्रजनन दर  2.2  है, स्थिरता वाले मान से थोड़ा अधिक।

इन आंकड़ों को शब्दश: नही लिया जाना चाहिए, किंतु इससे अलग-अलग राज्यों की स्थिति का अंदाजा अवश्य लगता है। छोटे राज्यों का प्रदर्शन अपेक्षया बेहतर रहा है। किंतु उत्तर प्रदेश एवं बिहार जैसे विशाल राज्यो के लिए ये प्रजनन दर अभी बहुत अधिक है, बिहार के लिए तो एकदम चिंताजनक। उत्तर प्रदेश की स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं होगी जितना उपर्युक्त जानकारी संकेत देतीहै।

जनसंख्या वृद्धि एक गंभीर समस्या है इसे एक बच्चा भी समझ सकता है। हमारे प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं। भूक्षेत्र बढ़ नहीं सकता, बनीय क्षेत्र सीमित है, जल से स्रोत सीमित हैं, आदि-आदि। तब इतनी-सी सामान्य बात शासन चलाने वाले और जनता क्यों नहीं समझ पाते हैं कि बढ़ती जनसंख्या के लिए इन संसाधनों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता घटती जाएगी। – योगेन्द्र जोशी

 

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के साथ छेड़छाड़। क्या वाकई छेड़छाड़ हो सकती है?

 

 

 

फ़रवरी-मार्च, 2017, के राज्यस्तरीय चुनाव

विगत फरवरी-मार्च में संपन्न हुए पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा को अच्छी कामयाबी मिली थी खास तौर पर उत्तर प्रदेश में। इस राज्य में उसे उम्मीद से कहीं अधिक विधानसभा सीटें मिलीं और सपा-कांग्रेस गठबंधन तथा बसपा को बहुत कम। बसपा तो उम्मीद लगाये बैठी थी कि इस बार वही सत्ता पर काबिज होगी। अपनी करारी हार से तिलमिलाई बसपा ने तुरंत ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को अपनी हार के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। मायावतीजी ने दावा किया कि भाजपा ने ईवीएम के साथ छेड़खानी करके/करवाके सीटें पाई हैं।

उधर पंजाब में “आआपा” (आप) के संयोजक केजरीवालजी आश्वस्त थे कि सत्ता तो उन्हीं के हाथ में आनी है। दुर्भाग्य से कांग्रेस के मुकाबिले वे कहीं के नहीं रहे। कांग्रेस अच्छे-खासे बहुमत के साथ सरकार बना गयी। केजरीवालजी ने भी ईवीएम के साथ छेड़खानी की बात कह दी और भाजपा को जिम्मेदार ठहराया। उनका तर्क या कुतर्क सुनिए: “भाजपा ने कांग्रेस को जिताया, क्योंकि वे स्वयं जीतते तो उनकी पोल खुल जाती। उन्होंने हमको हराने के लिए कांग्रेस को जिताया। वे हमको राजनीति से खत्म करना चाहते हैं, क्योंकि उनको असली खतरा हम से है।”

उत्तर प्रदेश की सपा ने भी अच्छा मौका देखा और “काम बोलता है के नारे से जनता को मूर्ख बना रहे” अखिलेश भैया ने भी बेचारी ईवीएम पर सारा दोष मढ़ दिया।

बेचारी ईवीएम! – छेड़खानी की शिकार?

ध्यान दें कि भाजपा (गठबंधन) की जीत उत्तर प्रदेश में ही अप्रत्याशित थी। उत्तराखंड में जीतना अप्रत्याशित नहीं था। पंजाब में तो उसका गठबंधन आआपा (आप) से भी पीछे रहा। गोवा तथा मणिपुर में तो वह कांग्रेस से पीछे रही: यह अलग बात है कि इन जगहों पर वह सरकार बनाने में सफल रही।

छेड़खानी की बात केवल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, एवं पंजाब के संदर्भ में की गई है। भाजपा ने कथित ईवीएम-छेड़खानी वहां क्यों नहीं की इसका उत्तर देने की विपक्षियों ने चिंता नहीं की ! छेड़खानी के विषय पर अधिक जानकारी इंटरनेट स्रोतों से मिल सकती है। उदाहरार्थ मायावतीजी के आरोपकेजरीवालजी की बातेंअखिलेश भैया की शंका और निर्वाचन आयोग की सफाई संबधित लिंकों से यहां प्राप्य हैं।

अब जो बहस मीडिया में, राजनीतिक दलों के बीच, उच्चतम न्यायालय में, और राष्ट्रपति महोद्य तक पहुंची है वह है कि ईवीएम भरोसेमंद नहीं हैं और हमें कागजी मतपत्रों पर लौट आना चाहिए। खैर, वर्षों पहले सकारण छोड़े जा चुके मतपत्रों के प्रयोग पर क्या लौट जाना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर निर्वाचन के विभिन्न पहलुओं पर निर्भर करता है। इस विषय पर मैं कोई राय व्यक्त नहीं कर रहा हूं। मैं तो यहां मशीनों के साथ संभव छेड़खानी के विषय में कुछ कहना चाहता हूं।

आरंभिक टिप्पणी

मैं फिजिक्स एवं कंप्यूटर-विज्ञान का विश्वविद्यालयीय शिक्षक रह चुका हूं और आधुनिक अंकीय तकनीकी (digital technology) से वाकिफ़ हूं। इसलिए वस्तुनिष्ठ संभावनाओं की बात कर सकता हूं। कौन जीत रहा है और कौन नहीं से मेरा कोई सरोकार नहीं। दरअसल मैं तो नोटा (NOTA) का पक्षधर हूं, और पिछले 15-20 वर्षों से किसी भी दल को मत नहीं दे रहा; वोट डालता जरूर हूं।

आरंभ में ही यह बता देना आवश्यक है कि मनुष्य की बनाई ऐसी कोई मशीन/युक्ति नहीं है जिसके साथ छेड़छाड़ न हो सके। उसके लिए बस कुछ शर्तें हैं:

(1) छेड़छाड़ करने या उससे मन-माफ़िक काम लेने का इरादा हो।

(2) इच्छुक व्यक्ति या उसके मददगार को मशीन की कार्यप्रणाली की समुचित जानकारी हो।

(3) व्यक्ति/मददगार को वांछित अवसर तथा संसाधन उपलब्ध हों।

(1) छेड़छाड़ का इरादा

जहां तक इरादे का सवाल है ऐसा इरादा भारतीय राजनेता रखते हों तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। जिस देश में येनकेन प्रकारेण सत्ता हथियाने की होड़ मची हो, राजनेता बरसाती मेढकों की भांति दलों के बीच फुदकते हों, सिद्धांतहीन एवं बेमेल गठबंधनों से परहेज न हो, धर्म-जाति आदि की भावनाएं भड़काकर वोट बटोरें जायें, चुनाव में सफलता पाने हेतु मतदाताओं को पैसा, साड़ी आदि बांटने से परहेज न हो, वहां नेताओं का क्या भरोसा?

किंतु निर्वाचन आयोग (इलेक्शन कमिशन) भी किसी दल/विशेष के पक्ष में ऐसा इरादा रखता होगा इस बात में मुझे यक़ीन नहीं होता है। मेरा मानना है कि पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त शेषन के कार्यकाल के बाद आयोग अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा है। वह भाजपा या अन्य दल के दबाव में आकर ऐसा अनर्थ करेगा मैं नहीं मानता, भले ही मायावतीजी तथा केजरीवालजी ऐसा कहते हों।

मेरी जानकारी में ये मशीनें (ईवीएम) निर्वाचन आयोग की संपदा हैं। इनकी खरीद-फरोख्त, उपयोग, रखरखाव तथा सुरक्षा आदि की जिम्मेदारी पूरी तरह से आयोग की होती है। सरकारें उसके द्वारा मांगी गई मदद तो पूरी करती हैं, किंतु आयोग से बाहर के तकनीकी जानकार की पंहुच मशीनों तक नहीं हो सकती जब तक आयोग न चाहे। मतलब यह है कि मशीनों से छेड़छाड़ बिना आयोग की सांठगांठ के संभव नहीं।

तो क्या आयोग ने बीते मार्च के चुनाओं में दल-विशेष (उत्तर प्रदेश एवं उत्तरखंड में भाजपा एवं पंजाब में कांग्रेस) के पक्ष में इन मशीनों के साथ छेड़छाड़ की थी? समाचार माध्यमों के अनुसार केजरीवालजी तो यही दावा करते हैं और मायावतीजी तथा अन्य नेता अप्रत्यक्ष रूप में आयोग पर यही आरोप लगा रहे हैं। यदि आयोग स्वयं इतना गिर चुका है तो किसी भी चुनाव क्या भरोसा?

कितने देशवासी होंगे जो आयोग को कटघरे में खड़ा करना चाहेंगे? व्यक्तिगत तौर पर मैं किसी भी नेता की तुलना में आयोग पर भरोसा करूंगा !

वोटिंग मशीनों की सुरक्षा आयोग की जिम्मेदारी है, लेकिन उसे स्थानीय प्रशासन के सहयोग की आवश्यकता होती है, जो चुनाओं के दौरान उसी के नियंत्रण में रहता है। फिर भी हो सकता है कि कहीं-कहीं प्रशासन मशीनों के साथ खिलवाड़ करे। लेकिन ऐसा लगभग हर निर्वाचन क्षेत्र में हुआ होगा और जानकार लोगों से तकनीकी मदद मिली होगी ऐसा मुझे नहीं लगता। अगर ऐसा है तो प्रादेशिक प्रशासन पूर्णतः भ्रष्ट माना जाएगा। क्या ऐसा हुआ होगा?

(2) डिजिटल डिवाइसेज़ (अंकीय युक्तियां)

किसी अंकीय (digital) युक्ति या मशीन को खराब करने लिए विशेषज्ञता की जरूरत नहीं। परंतु उससे जोड़तोड़ करके मनमाफिक काम लेना उसी व्यक्ति के लिए संभव है जो उसकी कार्यप्रणाली और उसके कलपुर्जों की भूमिका से भलीभांति परिचित हो। अतः ईवीएम से छेड़खानी किसी सिद्धहस्त व्यक्ति के बिना संभव नहीं।

किसी घटना के होने की सैद्धांतिक संभावना एक बात है और उसका वास्तविकता के धरातल पर घटित हो ही जाना नितांत दूसरी बात है।

इस विषय पर मैंने एक लेख 20 मार्च के अपने अन्य ब्लॉग में प्रस्तुत किया है।

(3) ईवीएम के साथ कैसे होगी छेड़छाड़?

अब आइए मुद्दे के तीसरे और असली पह्लू पर। अर्थात् ईवीएम के साथ छेड़खानी करने के अवसर और उसके लिए आवश्यक सामग्री/संसाधन।

मैंने ईवीएम के तकनीकी पक्ष की संक्षिप्त जानकारी पाने के लिए इंटरनेट स्रोतों को खंगाला। उदाहरण के तौर पर दो स्रोतों का उल्लेख कर रहा हूं: (1) विकीपीडिया (wikipedia) एवं (2) गिज़मोडो (gizmodo), जिनसे मिली जानकारी मुझे भरोसेमंद लगती है।

निम्नलिखित बिंदुओं पर गौर करें:

(क) ईवीएम मशीन

संक्षेप में यह बता दूं कि ईवीएम के दो घटक या इकाइयां होती हैं: (1) नियंत्रण इकाई (control unit), और (2) मतदान इकाई (balloting unit)। पहली इकाई मतदान अधिकारी के नियंत्रण में होती है और दूसरी इकाई से 15-20 फ़ुट लंबे केबल (तार) द्वारा जुड़ी होती है। इसी केबल के माध्यम से दोनों इकाइयों के बीच संकेतों का आदान-प्रदान होता है। मतदाता द्वारा दूसरी इकाई पर चुने गए बटन के अनुसार समुचित संकेत पहली इकाई को प्राप्त होता है और वह डाले गये मतों को अंकीय आंकड़ों के रूप में नियंत्रण इकाई की स्मृति (memory) में सुरक्षित (संचित, saved) रखता है। मतदान की समाप्ति पर अधिकारी उसे “स्विच-ऑफ़” करके मुहरबंद यानी सील कर देता है।

(ख) EPROM (ईप्रॉम) एवं EEPROM (ईईप्रॉम)

मेरी जानकारी के अनुसार इन मशीनों में सूचना-भंडारण (information storage) के लिए (1) ईप्रॉम (EPROM = Erasable Programmable Read-Only Memory), या (2)  ईईप्रॉम (EEPROM = Electrically Erasable Programmable Read-Only Memory) स्मृति-चिपों का प्रयोग होता है। इन चिपों में भंडारित जानकारी तब तक सुरक्षित रहती है जब तक कि उसे (1) पराबैंगनी विकिरण (ultraviolet radiation) द्वारा मिटाया न जाए (EPROM); या (2) उसके साथ संगति रखने वाले किसी डिजिटल युक्ति (digital device compatible with the memory chip) के द्वारा उसे मिटाया न जाए (EEPROM)। यह कार्य केवल जानकार व्यक्ति ही कर सकता है और वह भी तब जब उसे अवसर मिले। स्मृति-चिपों में भंडारित सूचना में मनमाफिक परिवर्तन करना संभव तो है किंतु आसान नहीं। इन तक पहुंच होनी चाहिए, वह कैसे होगी? चूंकि मतदान के बाद ईवीएम को “स्विच-ऑफ” कर दिया जाता है और उसे केवल मत-गणना के समय ही “स्विच-ऑन” किया जाता है, अत: ऐसा अवसर मिल नहीं सकता। हां, सुरक्षाकर्मी ही लापरवाही बरतें तो बात अलग है।

(ग) रिमोट कंट्रोल

किसी मशीन में संचित सूचना को दूरस्थ संकेतन (remote signalling) द्वारा भी मनमाफिक बदला जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के लिए उसे सक्रिय (active) अथवा तैयारी-अवस्था (standby mode) में होना चाहिए। इन अवस्थाओं में वह बाहर से रेडियोवेव (radio wave), माइक्रोवेव (microwave), अथवा प्रकाश-विद्युत (electro-optical) आदि सकेतन विधियों (signalling methods) के द्वारा सूचना-विनिमय (information exchange) के लिए तैयार हो सकता है। किंतु तब उसकी “पावर सप्लाइ ऑन” रहनी चाहिए। मेरी जानकारी में ईवीएम में दूरस्थ संकेतन की कोई व्यवस्था नहीं होती है। यानी ब्ल्यूटूथ  तकनीकी (bluetooth technique) अथवा इंटरनेट संकेतों (internet signals) सरीखे माध्यमों से उसमें संचित सूचना के साथ छेड़छाड़ संभव नहीं। अगर ऐसी संकेतन विधि होती तो भी वह निरुपयोगी हो जाती, क्योंकि मतदान के बाद इन मशीनों को “स्विच-ऑफ” कर दिया जाता है। मोबाइल फोन इस्तेमाल करने और    टीवी देखने वाले भी इस बात को समझते हैं कि टेलिविज़न स्विच-ऑफ करने के बाद रिमोट कंट्रोल निष्प्रभावी हो जाता है।

(घ) एलेक्ट्रॉनिक चिप पर गुप्त कूट

“आप” संयोजक केजरीवालजी का कहना है कि वे इंजीनियरिंग डिग्री-धारक हैं (आईआईटी, खड़कपुर)। इसीलिए वे वोटिंग मशीनों के साथ छेड़छाड का दावा बेझिझक करते हैं। सभी डिजिटल मशीनों के साथ छेड़छाड़ की जा सक्ती है यह मैं भी मानता हूं, किंतु कैसे, कब, किसके द्वारा, आदि प्रश्नों के उत्तर इतने आसान नहीं। इंजीनियरिंग डिग्री होना पर्याप्त नहीं, संबंधित मशीन (ईवीएम) की कार्यप्रणाली का व्यावहारिक ज्ञान/अनुभव होना जरूरी है, जो उन्हें होगा नहीं, क्योंकि वे इंजीनियरिंग व्यवसाय में शायद कभी नहीं रहे । उनकी शंका का समाधान जरूरी है।

केजरीवालजी कहते हैं कि वोटिंग मशीन बनाने में इस्तेमाल किए गए डिजिटल चिप्स (digital chips) में दल-विशेष के पक्ष में मतों की संख्या बढ़ाने हेतु गुप्त कूट (secret codes) इरादातन डाले गये हैं। उनके अनुसार वोटिंग मशीनों की प्रचालन तंत्र (प्रणाली, operating system) इन कूट-संकेतों का प्रयोग करते हुए किसी एक प्रत्याशी के पक्ष में डाले गए मत को पहले से चुने गए किसी अन्य के खाते में स्थानांतरित कर सकती हैं। इसे उदाहरण से समझिए: 8वें क्रम का बटन दबाने पर वोट 8वें प्रत्याशी को मिले वोटों में जोड़ने के बजाय मशीन का सॉफ्टवेयर 5वें प्रत्याशी के मतों में जोड़ रहा हो। यह भी संभव है कि बीच-बीच में कुछ वोट 8वें के नाम पर ही सही दर्ज हो रहे हों। कदाचित ऐसा ही किसी अन्य – जैसे तीसरे क्रम वाले प्रत्याशी – के मामले में भी हो रहा हो। संभावनाएं कई तरीके की हो सकती हैं। कुल मिलाकर उक्त उदाहरण में 5वें को मिले वोट अधिक दर्ज हो रहे हों और दूसरों को उतने का घाटा हो रहा हो। मशीन के साथ ऐसी छेड़छाड़ गुप्त कूटों के प्रयोग से हो रही होगी।

पाठकों का ध्यान मैं इस बात की ओर खींचता हूं कि चिप-निर्माता कंपनियां अकेली एक अनूठी चिप नहीं बनाते। दरअसल एक जैसी चिपें हजारों/लाखों की संख्या में बाजार में उतारी जाती हैं। मतलब यह है कि सभी वोटिंग मशीनों में एक जैसी चिपें प्रयुक्त होती हैं, और यदि उनमें कोई गुप्त कूट हो तो वह सभी मशीनों पर एक ही प्रकार से कार्य करेगा। यह अवश्य संभव है कि मशीनों पर सक्रिय प्रचालन तंत्र (operating system/software) अलग-अलग मशीनों पर अलग-अलग हेराफेरी के लिए ढाला गया हो। अर्थात कोई ईवीएम 8वें बटन के वोट को 5वें में दर्ज करे तो कोई दूसरी मशीन उसे 9वीं पर दर्ज करे। साफ जाहिर है कि किसी दल विशेष के पक्ष में धांधली करनी हो तो यह पहले से मालूम होना चाहिए कि उसके प्रत्याशी के लिए निर्धारित बटन ईवीएम पर कौन-सा है। तब छेड़खानी करने वाला मशीन के प्रचालन तंत्र को उसी के अनुरूप निर्देश देकर चाहा गया मकसद पूरा कर सकता है।

यहां एक गंभीर शंका उठाई जा सकती है, जिसका संतोषप्रद समाधान केजरीवालजी के पास नहीं होगा। हर निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों की सूची एक जैसी नहीं होती है। दरअसल सूची के शीर्ष पर राष्ट्रीय दलों (AITC, BJP, BSP, CPI, CPI-M, INC, NCP) के प्रत्याशियों के नाम होते हैं, तत्पश्चात् प्रादेशिक (क्षेत्रीय) दलों के, फिर अन्य दलों के और अंत में स्वतंत्र प्रत्याशीगण। इन चारों में से प्रत्येक श्रेणी में प्रत्याशियों के नाम वर्णक्रमानुसार (alphabetically) सूचीबद्ध रहते हैं। चूंकि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में प्रत्याशियों के नाम अलग-अलग होते हैं इसलिए किसी खास दल के सभी प्रत्याशी पूरे देश/प्रदेश में एक ही सुनिश्चित क्रम पर हों ऐसा विरल संयोग संभव नहीं। तात्पर्य यह है कि कांग्रेसी (INC) प्रत्याशी (उदाहरणार्थ) यदि एक क्षेत्र में छठे क्रम पर हो तो दूसरे क्षेत्र में तीसरे या चौथे आदि पर हो सकता है। इसलिए कांग्रेस प्रत्याशी के वोट किसी और को मिलें, अथवा दूसरों के वोट काग्रेस को मिलें ऐसी छेड़खानी ईवीएम के साथ तब तक संभव नहीं जब तक प्रत्याशियों की सूची को अंतिम रूप न दे दिया गया हो। यह सब कहने का तात्पर्य है कि विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों की मशीनों के साथ अलग-अलग हेराफेरी करना होगी और वह भी जानकार व्यक्ति द्वारा।

निष्कर्ष यह है कि चिप पर संचित एक ही गुप्त कूट अथवा एक ही ऑपरेटिंग सिस्टम वाले मशीनों से अलग-अलग परिणाम मिलें ऐसी छेड़खानी संभव नहीं।

ईवीएम या मतपत्र (ballot paper) पर प्रत्याशियों के नामों के क्रम के बारे में जानकारी इंडियन एक्सप्रेस के लेख अथवा “कोरा” (quora.com) वेब-साइट पर से मिल सकती है।

(ङ) वीवीपीएटी (Voter Verified Paper Audit Trail) मशीन

पिछले चुनावों मे चुनाव आयोग ने कुछ मतदान केंद्रों पर वीवीपीएटी (VVPAT) मशीनों का भी प्रयोग किया था जिसका मुझे भी अनुभव हुआ। चूंकि मैंने नोटा (NOTA, ईवीएम पर अंतिम) बटन दबाया था, इसलिए मुझे मशीन पर संबंधित पर्ची 2-3 सेकंड के लिए देखने को मिली जो तुरंत ही एक संग्रह-डिब्बे में चली गई।

वीवीपीएटी के प्रयोग से मतदाता को तसल्ली हो जाती है कि उसका मत चुने हुए प्रत्याशी के पक्ष में ही पड़ा है। इनका असल सार्थक उपयोग तभी हो सकता है जब ईवीएम द्वारा प्रदर्शित वोटों और वीवीपीएटी की पर्चियों का मिलान वोटों की गिनती के समय किया जाये। लेकिन इनके इस्तेमाल से यह सिद्ध नहीं होता कि ईवीएम के साथ छेड़खानी नहीं हुई है। मेरा यह कथन इस संभावना पर आधारित है कि ईवीएम का ऑपरेटिंग सिस्टम बैलटिंग इकाई से प्राप्त जानकारी वीवीपीएटी तक तो सही-सही पहुंचाए, और उसके बाद वोटों में हेराफ़ेरी करे। ऐसा प्रोग्राम जानकार व्यक्ति लिख ही सकता है।

अंत में – कुंठाजनित  तर्क

दुनिया के अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस आदि सरीखे तकनीकी तौर पर विकसित देशों में ईवीएम इस्तेमाल नहीं होते हैं तो हमारे यहां क्यों इस्तेमाल हो रहे हैं यह सवाल आप पार्टी का निहायत बचकाना, तर्कहीन और हीनभावना का द्योतक है। क्या वे देश हमारे लिए मानक तय करेंगे? हमें अपने विचारों एवं जरूरतों के अनुसार चलना चाहिए या उनकी नकल आंख मूंद के करनी चाहिए? क्या हमारे देश में परमाणु विस्फोट, मिसाइल विकास, उपग्रह-प्रक्षेपण, चंद्रयान आदि उनके अनुसार हुए हैं? जो भी हमने किया है, कर रहे हैं और करेंगे वह हमारी आवश्यकता एवं हमारे संसाधन तय करेंगे।

चुनावों में वोटिंग मशीनों का प्रयोग हमारी आवश्यकता थी और मेरी जानकारी में उसकी तकनीकी भी देश में ही विकसित हुई है; हम उसे क्यों न इस्तेमाल करें? अमेरिका उसे इस्तेमाल नहीं करता इसलिए हमें भी उससे परहेज करना चाहिए क्या? हमारे अपने स्वतंत्र निर्णय नहीं होने चाहिए क्या? वस्तुतः विदेश, विदेशी वस्तुएं, विदेशी विचार आज भी हमें श्रेष्ठतर लगते हैं। अवश्य ही हमें उन देशों से बहुत कुछ सीखना चाहिए किंतु सब कुछ नहीं। हम भी किसी क्षेत्र में प्रथम हो सकते हैं यह विचार मन में क्यों नही आने देते हैं? – योगेन्द्र जोशी

गण्तंत्र दिवस 2017 – खोया अधिक और पाया कम

आज 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस, है। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद शासकीय व्यवस्था के लिए स्वीकृत संविधान के प्रभावी होने के प्रथम दिन (सन् 2050) की स्मृति में मनाये जाने वाला राष्ट्रीय उत्सव।

इस अवसर पर सभी देशवासियों के प्रति मेरी हृदय से शुभेच्छाएं।

विगत वर्ष की एक स्मराणीय बड़ी शासकीय घटना “विमुद्रीकरण अर्थात् नोटबंदी से पैदा हुई दिक्कतों से अब कुछ हद तक देशवासी उबर चुके होंगे, और बचीखुची अड़चनों से शीघ्र ही मुक्ति पा जायेंगे यह मेरी आशा और अपेक्षा है।

देशवासी आज के दिन हर्षित होंगे ही। अपने लोकतंत्र की सफलता को लेकर काफी हद तक संतुष्ट एवं भावी काल के लिए आशान्वित होंगे ही। मैं स्वयं को एक अपवाद के रूप में देखता हूं। कदाचित कुछ गिनेचुने अन्य जन भी मेरी तरह सोचते होंगे। मैं इस दिन, और इसी प्रकार स्वाधीनता दिवस (15 अगस्त), पर खुद को संतुष्ट नहीं पाता।

क्या हमारे गणतंत्र की खामियां – जो भी रही हों – समय के साथ दूर हुयी हैं? क्या हमारी राजनीति दिन-ब-दिन सुधार की दिशा में अग्रसर हुई है? क्या जिन उद्येश्यों के साथ गणतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना हुई थी वे पूरे हुए हैं? या उनके पूरे होने की ओर हम संतोषप्रद तरीके से बढ़ रहे हैं? इस प्रकार के प्रश्न जब मेरे मन में उठते हैं तो मैं स्वयं को संतुष्ट नहीं देख पाता। मेरी सोच और दृष्टि में दोष है, अथवा वस्तुस्थिति ही जैसी होनी चाहिए उसके निकट नहीं है? इस प्रश्न का उत्तर अन्य जन ही मुझे दे सकते हैं।

इसके पहले कि मैं अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करूं मैं एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा। मैं समझता हूं कुछ लोगों की नजर में गणतंत्र (अंग्रेजी में रिपब्लिक) जनतंत्र/लोकतंत्र (डेमोक्रसी) का ही पर्याय है। हमारे गणतंत्र में देश के राज्य गणतांत्रिक इकाइयां हैं, जिनमें से प्रत्येक स्वयं में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाये है। मुझे शंका है कि संघशासित प्रदेश (यूनियन-गवर्न्ड टेरिटरी) एक इकाई वाली इस परिभाषा में आते हैं कि नहीं। वे सीधे केंद्र सरकार के अधीन होते हैं अतः “गण” की परिभाषा उन पर लागू नहीं होती है। अतः मेरे मत में देश को किंचित् परिवर्तित गणतंत्र कहना अधिक उचित होगा। अस्तु, इस बात को विशेष महत्त्व देने की जरूरत नहीं।

मेरा अनुभव मुख्यतः उत्तर प्रदेश और उस पर विशेषतया मेरे शहर वाराणसी पर आधारित हैं। हो सकता है अन्य राज्यों में स्थिति बेहतर हो, लेकिन कुल मिलाकर हम शासकीय व्यवस्था के गिरावट के दौर से गुजर्र रहे हैं ऐसा मेरा मानना है।

वापस अपने उपर्युक्त शंकाओं/प्रश्नों पर। जीवन के सातवें (यानी साठ का दशक) पूरा करने के निकट पहुंचे वरिष्ठ नागरिक के तौर पर मैं यह कह सकता हूं कि मैंने राजनीति एवं लोकतंत्र की पर्याप्त समझ अर्जित की है। क्या होना चाहिए और क्या हो रहा है में भेद कर सकने में मैं काफी हद तक सक्षम हूं। मुझे नेहरू-काल के अंतिम दिनों की याद है। याद है उस समय के चीनी आक्रमण की। याद है उस काल के पीएल480 योजना के अंतर्गत अमेरिका से आयातित जीरा सदृश लाल गेहूं की। याद है जब कांग्रेस ही एक प्रकार से देश में एकछत्र राज कर रही थी और “नेहरू के बाद कौन संभालेगा देश को” जैसी कुछ लोगों की चिंताओं की। याद है जब अन्य राजनैतिक दल अस्तित्व में आ रहे थे। किशोरावस्था से वयस्कता के सोपन पर चढ़ते हुए एक नागरिक के तौर पर शासकीय व्यवस्था की मेरी समझ तब नितांत अपरिपक्व रही होगी यह मैं स्वीकारता हूं। कालान्तर में नौकरी-पेशे (विश्वविद्यालय अध्यापन) में आने पर और प्रशासनिक/नागरिक व्यवस्था के संपर्क में आते-आते तथा मतदान का अधिकार पाते-पाते विषय की मेरी समझ में शनैः-शनैः परिपक्वता आते गयी । हाल के डेढ़-दो दशकों में तो विषय को समझने में रुचि विशेषतः बढ़ गयी। मेरे विचारों से अन्य जन सहमत हों मैं इस मुगालते में कभी नहीं रहता। मेरी शंकाएं:

(1) हमारे संविधान की प्रस्तावना में साफ उल्लिखित है कि हम देशवासी इस राष्ट्र को “पंथनिरपेक्ष/धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक, गणतंत्र” के रूप में स्वीकारते हैं। पंथनिरपेक्ष शब्द श्रीमती गांधी ने संधोधन के तौर पर शामिल किया था। देश का स्वरूप बदला नहीं। देश को संविधान-निर्माताओं ने आरंभ में ही “सेक्युलर” क्यों नही कहा? यह बात विचारणीय है। खैर, मेरी आपत्ति है “समाजवादी” पर है। क्या देश को बाद के राजनेता समाजवाद की ओर ले गये? आज अमीर और गरीब की खाई तब से बहुत बढ़ गयी। क्या एक समाजवादी देश में यह होना चाहिए था?

(2) संविधान जातिमुकत होने की लालसा व्यक्त करता है। शुरुआती दौर में जाति और धर्म वोट के आधार पर नहीं होते थे। समय के साथ राजनीति में आयी नई पीढ़ी के नेताओं ने इन भावनाओं को भुनाकर वोटबैंक बना डाले। यही अपेक्षा की गयी थी क्या?

(3) पुराने जीवित बचे लोग बताते थे कि वोट पाने के लिए आज की तरह बेतहासा धन खर्च नहीं होता था। सुनते है कि अब सांसद/विधायक बनने के लिए करोड़ों दांव पर लगाये जाते हैं। यह भी कहा जाता कि पार्टियों के टिकट के लिए करोड़ों की बोली लगती है। यह हमारे नेताओं के सच्चरित्र होने का द्योतक है क्या?

(4) पिछले तीन-चार दशकों में धनबलियों, बाहुबलियों और आपराधिक छबि वालों की राजनीति में तादाद बढ़ती गयी है। सांसंदों/विधायकों में उनकी दागदार छवि वालों की संख्या 30% के आसपास बतायी जाती है। क्या ऐसा शुरुआती दौर में था?

(5) वर्तमान समय में राजनैतिक दलों और उनके सदस्यों का एक ही सिद्धन्त रह गया है कि कोई सिद्धांत नहीं। विशुद्ध मौकापरस्ती। जहां लाभ उधर चलो की नीति। इसलिए दलबदलुओं की भरमार है सभी दलों में। जिसे जिताऊ समझते हैं उसे अपनी ओर खींच लेते हैं। जो कल तक सेक्युलर था वह आज सांप्रदायिक बन जाता है, दक्षिणपंथी समाजवादी बन जाता है। सिद्धांतहीनता व्यक्तियों में ही नहीं दलों में होती है जो सिद्धांतहीनों का बढ़चढ़कर स्वागत करते हैं, बेशर्मी से अपने कदम सही ठहराते हुए।

(6) आज की राजनीति में परिवारवाद चरम पर है। और बड़ा बेहूदा तर्क (कुतर्क?) पेश किया जाता है। कहते है डाक्टर का बेटा-बेटी डाक्टर, वकील का बेटा-बेटी वकील, उद्यमी (बिज़नेसमैन) का बेटा-बेटी उद्यमी तो राजनेता का बेटा क्यों नहीं राजनेता हो सकता है? वाह ! मेरा सवाल है कि क्या राजनीति भी डाक्टरी, वकालत, उद्यमिता इत्यादि की तरह का ही धंधा है? जीवन-यापन और धन कमाने का व्यवसाय है क्या राजनीति? जिन व्यवसायों से तुलना की जाती हैं उसमें समाजसेवा या सामाजिक व्यवस्था को सुचारु और कुशल बनाने का ध्येय नहीं होता है। उन व्यवसाय में लगे हाथ कोई समाजसेवा करता है तो यह उसकी रुचि होती है न कि व्यवसाय के स्थापित एवं स्वीकृत उद्येश्य का कार्य। हर व्यवसाय में पहले अनुभव और योग्यता हासिल किये जाते हैं। इस पर भी गौर करें कि स्वाधीनता के बाद के भारत में जो नये नेता आये वे बाप-दादाओं की विरासत पर नहीं आये बल्कि अपने बल पर आये, लेकिन उन्होंने ही अपनी अगली पीढ़ी को विरासत के नाम पर आगे बढ़ाया। स्वतंत्रता संघर्ष वाले कितने नेताओं की बहू-बेटियां राजनीति में हैं? तो आज के नेताओं के कितने हैं? सोचिये!

(7) आज वोट की राजनीति नकारात्मक है न कि सकारात्मक। दूसरे दलों में कमियां खोज-खोजकर वोट बटोरे जाते हैं। कोई यह नहीं कहता है कि देश/प्रदेश के दीर्घकालिक हितों के लिए उसकी क्या योजनाएं हैं। जनसंख्या, चिकित्सकीय व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली, न्यायिक सुधार, प्रशासनिक गुणवत्ता की बातें करता है कोई? तो क्या ऐसी वोट की राजनीति ही वंछित लोकतंत्र है?

(8) लोकलुभावन वादों के साथ आज के नेता मैदान में उतरते हैं। कोई स्मार्ट्फोन बांटने की बात करता  है, तो कोई मुफ्त अनाज देने की, कोई मुफ़्त बिजली-पानी देने की बात करता है? इत्यादि। खजाना देश का लुटे और वोट तथा सत्तासुख हम भोगें इस नीति पर राजनैतिक चल रहे हैं। देश का भला ऐसे ही होगा क्या?

इस प्रकार के तमाम सवाल उठते हैं मन में। अब आप ही बतायें कि राजनीति की किस बात पर संतोष अनुभव किया जाये? – योगेन्द्र जोशी

राजनैतिक दांवपेंच में माहिर मुलायम सिंह का अखिलेश को समाजवादी पार्टी सौंपने का नाटक

%e0%a4%85%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a4%b0

 

 

 

 

 

 

दिनांक 16 जनवरी (2017)। हफ़्तों से चले आ रहे समाजवादी पार्टी के पारिवारिक नाटक का अंत हो गया। चुनाव आयोग ने भी घोषित कर दिया कि इस पारिवारिक “राजनैतिक” पार्टी के दो फाड़ हो चुके हैं जिसका बड़ा धड़ा अखिलेश के पाले में जा चुका है। आयोग के नियमानुसार यही गुट अब “समाजवादी पार्टी” कहलायेगा जिसका राष्ट्रीय अध्यक्ष मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव होंगे और गरीबों के गमनागन का साधन दोपहिया “साइकिल” बतौर चुनाव-चिह्न इस्तेमाल करने के वे ही हकदार होंगे। मुलायम सिंह और उनके अनुयायीयों (चाटुकार और पिछलग्गू?) को पार्टी के उस नाम से हाथ धोना पड़ा है जिसे उन्होंने प्रदेश की राजनीति में करीब ढाई दशक से पाला-पोसा और प्रायः अजेय दल के रूप में स्थापित किया। मुलायम सिंह, शिवपाल, अमर सिंह (?) तथा शेष विवश नेता अब क्या करेंगे ये वे ही ठीक-ठीक बता पायेंगे। निश्चय ही कई नेता होंगे जो असमंजस की स्थिति में होंगे कि किस धड़े का हिस्सा बनें।

ऊपरी तौर पर देखा जाये तो यह घटना बाप-बेटे के बीच की वर्चस्व की लड़ाई थी। अखिलेश अपनी “साफ-सुथरी” (कितनी साफ-सुथरी?) छवि को और चमकाने के चक्कर में रहे, इसलिए वे अपने सगे चाचा के उन चहेतों से छुटकारा चाहते थे जिनकी छवि आपराधिक बताई जाती है। दूसरी तरफ चाचा का सीधा-सादा उद्येश्य था किसी भी प्रकार से चुनावों में जीत हासिल करना और बहुमत हासिल करना। चाचा का तर्क सीधा था: हमें जिताऊ प्रत्याशी चाहिए चाहे वह आपराधिक छवि का ही क्यों न हो। स्पष्ट है कि चाचा-भतीजे में निभ नहीं रही थी। दूसरी तरफ एक पीढ़ी दूर के दूसरे चाचा अखिलेश के पक्ष में रहे और उनका मार्गदर्शन करते रहे। झगड़ा यादव परिवार के भीतर का था और वही समाजवादी पार्टी का झगड़ा भी बन गया था जिसमें किसी भी पार्टी सदस्य की कोई भूमिका नहीं रही, सिवाय अनुनय-विनय करने के, जिसमें आजम खां प्रमुख थे।

क्या मुलायम सिंह वास्तव में अखिलेश के विरुद्ध थे? मेरा व्यक्तिगत मत है कि ऐसा नहीं था।  पांच साल पहले अखिलेश को गद्दी पर किसने बिठाया? क्या खूबी थी अखिलेश में? तब तक तो अखिलेश का कोई शासकीय अनुभव भी न था। क्या सपा में अनुभवी नेताओं का अकाल था?

भारतीय लोकतंत्र में प्रायः सभी दलों में मुखिया जो चाहे वही होता है। अन्य नेताओं की औकाद बंधुआ मजदूरों की जैसी होती है। उन्हें हां में हां मिलाना होता है, अन्यथा जिसमें स्वाभिमान होता है वह पार्टी छोड़ देता है। मुखिया ही ताउम्र अध्यक्ष होता है या उसके परिवार का उसका चहेता। ऐसे दलों में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उसी परिवार के सदस्यों का हक होता है। तो उस समय भी अखिलेश की जगह शिवपाल को मुख्यमंत्री बनाना अधिक तार्किक होता। वर्षों से उनका साथ निभाते आ रहे लक्ष्मण जैसे भाई के स्थान पर अखिलेश को क्यों चुना? हो सकता है मुलायम सिंह के समक्ष धर्मसंकट रहा हो, पर अंत में उन्होंने पुत्रमोह में अखिलेश को वरीयता दी होगी यह मेरा सुविचारित मत है। वे भाई को गद्दी सौंपकर बेटे के भविष्य को दांव पर नहीं लगाना चाहते होंगे। पुत्रमोह से प्रायः सभी ग्रस्त रहते हैं, खासकर राजनीति में।

मुलायम सिंह राजनीति के चतुर खिलाड़ी रहे हैं। वे इतने मूर्ख नहीं हो सकते थे कि बेटे के सामने हार मान लें। मुलायम सिंह 77 वर्ष हो चुके हैं और उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता है। इसलिए वे अपनी ढलती उम्र में समय रहते अखिलेश को सुस्थापित न करने की घोर गलती नहीं कर सकते थे। मतलब यह कि जो सपा परिवार (पार्टी कहें या परिवार कोई अंतर नहीं!) में हुआ वह सोचा-समझा नाटक था – देखने वालों में भ्रम पैदा करने के लिए।

मैं यही मानता हूं कि बाप-बेटे में मूक सहमति रही होगी कि कैसे नाटक खेला जाना है। उनके बीच अकेले में जो गुप्त बातें हुई होंगी उसका ब्योरा कौन दे सकता है भला?  मुलायम सिंह भली भांति जानते थे कि शिवपाल के खेमे के पार्टी-जनों – जिनमें कइयों की आपराधिक छवि रही है या अभी है – को साथ लेकर अखीलेश नहीं चल पायेंगे। उनकी मौजूदगी शिवपाल के हक में होती और वे अखिलेश को कमजोर भी कर सकते थे। मुलायम को यह भी याद रखना था कि शिवपाल और पार्टी के अनेक जन, जिन्हें अखिलेश नापसंद करते हैं, के उन पर एहसान हैं, क्योंकि उन्हीं के बल पर वे सपा को स्थापित कर सके और सफल हुए। उन सभी लोगों की नजर में मुलायम सिंह को उनका पक्षधर भी दिखना था और साथ में अपने बेटे को भी मजबूती देनी थी। तब रास्ता क्या था? यही न कि बाप-बेटा एक नाटक रचें जो सबको सच से दूर अंधेरे में रखे।

इस घटना को देख मुझे महाभारत का एक प्रकरण याद आता है। भीष्म पितामह कौरव-पांडव युद्ध में कौरवों (दुर्योधन आदि) की ओर से लड़े। यह सब जानते थे कि जब तक भीष्म जीवित रहेंगे तब तक पांडव युद्ध नहीं जीत सकते थे। यह स्वयं भीष्म ही थे जिन्होंने पांडवों को वह राज बताया कि कैसे वे मारे जा सकते हैं और पांडव जीत सकते हैं। कहने का मतलब यह कि भीष्म लड़ तो रहे थे युर्योधन की ओर से लेकिन युद्ध जिता रहे थे पांड़वों को। कुछ ऐसा ही मुलायम कर रहे थे। पक्ष लेते दिख रहे थे शिवपाल बगैरह का और छिपे तौर पर बेटे अखिलेश को आगे बढ़ा रहे थे।

दुर्भाग्य से नाटक का मंचन इतना अच्छा नहीं हो पाया कि वह हकीकत लगे। पैनी निगाह रखने वाले बहुत-से लोगों को अनुभव हो चुका है कि राजनीति के चतुर खिलाड़ी मुलायम सिंह बहुत कुछ सोच-समझके ही यह खेल खेले होंगे।

%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%85%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%b6

 

 

 

 

 

अब बाप-बेटे एक हो गये हैं। अखिलेश पिता से आशीर्वाद ले लिए हैं और मुलायम सिंह ने उनको अपने समर्थकों की सूची दे दी है जिनको अखिलेश ने टिकट देना है। उस सूची में शिवपाल का भी नाम है जिसे अखिलेश अपनी सूची से बाहर कर चुके थे। कभी आपने ऐसा नेता देखा है जो अपने कार्यकर्ताओं को विरोधी खेमे से प्रत्याशी बनने की सिफ़ारिश करे? मुलायम मौके की नजाकत के हिसाब से ऐसा भी कर सकते हैं।

%e0%a4%85%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%95-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a4%b0

 

 

 

 

 

 

 

पूरे घटनाक्रम से यही लगता था कि सपा दो धड़ों में बंट चुकी है और दोनों धड़े अपने-अपने प्रत्याशियों को मैदान में उतारेंगे। पर ऐसा हो नहीं रहा है। जरा गौर करिए इस लेख के आरंभ में प्रदर्शित अखिलेश के चुनावी बैनर पर, जिसमें पिता-पुत्र दोनों मौजूद हैं। दरअसल मुलायम सिंह अखिलेश की समाजवादी पार्टी के संरक्षक है और अब ताउम्र रेहेंगे।

भारतीय लोकतंत्र में सब कुछ हो सकता है। लोकतंत्र के भारतीय मॉडल को मैं छद्म राजतंत्र कहता हूं, जो लोकतंत्र की मूल भावना के प्रतिकूल है। ऐसे लोकतंत्र को नकारा जाना चाहिए “नोटा” बटन के माध्यम से विरोध जताकर। – योगेन्द्र जोशी

 

नोटों का विमुद्रीकरण (demonetization): सार्थक एवं निरर्थक टिप्पणियां और वह जो केंद्र सरकार ने किया होता।

 

विमुद्रीकरण की खबर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी जी ने मंगलवार 8 नवंबर की संध्या, यानी रात्रि प्रथम प्रहर, उस दिन तक प्रचलित 500 एवं 1000 के नोटों के विमुद्रीकरण की जो अप्रत्याशित घोषणा की उसके लिए देशवासी तैयार नहीं थे। इसमें दो राय नहीं कि जिस उद्देश्य से यह निर्णय सरकार ने लिया उस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। यह जरूर है कि बहुत से लोगों को इस निर्णय से परेशानी हुई है। बहुतों के लिए विमुद्रीकरण की खबर निराशा/हताशा का संदेश बनकर भी आई। खबर की ठीक-ठीक जानकारी का अभाव जनलेवा भी साबित हुई यह भी सुनने में आ रहा है। अगर ऐसा कुछ हुआ तो वह निःसंदेह खेदजनक था। मैं ऐसी स्थिति के पीछे उन लोगों की गलती कहूंगा जिन्होंने नोटों के बंद होने की आधी-अधूरी जानकारी अन्य जनों को देकर भ्रम की स्थिति पैदा की।

कुछ लोगों का कहना है कि नोटों के प्रचलन को बंद करने की सूचना समय पर दी गयी होती तो उन्हें संभलने का अवसर मिला होता। उन लोगों को समझना चाहिए कि पूरी प्रक्रिया को बेहद गोपनीय रखा गया था जिससे उन लोगों को संभलने का अवसर ही न मिले जिन्होंने अघोषित धनराशि घरों में जमा कर रखी हो। यह अवश्य है कि ऐसा करने पर उन लोगों को भी परेशानी हो गयी जिनका पैसा उस श्रेणी का नहीं था और जिन्होंने किसी न किसी आवश्यकता के अंतर्गत उसे घर में रखा था।

सरकार ने यह किया होता

     सरकार योजना को पूर्णतः गोपनीय रख सकी यह सराहनीय था। पूरी तैयारी करीब छः महीने पहले से चल रही थी फिर भी वह इस क़दर गोपनीय बनी रही इसके लिए संबधित अधिकारी-गण बधाई के पात्र हैं। तैयारी में कहीं कुछ कमी रह जाना आश्चर्य की बात नहीं है। मेरी समझ में निम्नलिखित बातें ध्यान में रखी गयी होतीं तो बेहतर होता:

(1) अगर उक्त घोषणा मंगल की रात्रि न करके गुरुवार की रात्रि की गयी होती तो शायद लोगों को कम असुविधा होती। दूसरे दिन शुक्रवार बैंक शेष तैयारी करने के लिए लेनदेन के लिए बंद रहते जैसा कि बुधवार को हुआ था। कई कार्यालयों में सप्ताहांत (शनिवार, रविवार) पर छुट्टी रहती हैं और कुछ के लिए शनिवार के दिन द्वितीय शनिवार (सेकंड सैटरडे) की छुट्टी रहती है, अतः लोगों को काम पर जाने की अफरातफ़री झेलते हुए तुरंत नोट बदलने की जल्दीबाजी न होती। लोगों को आश्वस्त होकर वस्तुस्थिति समझने और उसके साथ सामंजस्य बिठाने का समय मिल गया होता। बैंक खोले ही गये हैं तब भी खोले गये होते।

(2) अच्छा होता कि बैंकों के एटीएम से एक-दो दिन पहले से ही केवल सौ के नोट दिए जाते ताकि सौ के नोटों का मुद्राचलन अधिक हो गया होता। पूरी तरह गुप्त रखे अभियान की भनक इतने से न लगती। अफवाह या अनुमानबाजी का दौर चलता तो भी बैंकों का कारोबार बंद रहने से उनके माध्यम से पुराने नोटों को ठिकाने लगाना संभव न होता। कालाधन और जगह खपाना भी इतनी जल्दी संभव न होता। आजकल बहुत से लोगों की आदत छोटे नोट रखने की कम हो गयी है। वे लेनदेन में तुरंत 5 सौ का नोट पेश कर देते हैं। टोलप्लाज़ाओं पर यही तो हुआ था। देना 40-50 रुपये और पेश किये जा रहे थे 5 सौ के नोट। हर व्यक्ति को 4-4 सौ के नोट लौटाना टोलप्लाज़ा के लिए संभव न था। बाद में यह चुंगी बंद की गयी। वही आदेश आरंभ में ही आ गया होता तो लोग आतंकित न होते और जाम की स्थिति न बनती।

(3) 5 सौ, 2 हजार के नोटों के साथ 1 हजार के नोट को भी बैंको को मिले होते तो अच्छा होता। 1 हजार का नोट तो सरकार लाने वाली ही है। पहले ही ले आती तो जहां 2 हजार को छुट्टा करने के लिए 4 पांच-पांच सौ के नोट चाहिए वहीं केवल 2 एक-एक हजार के नोटों की जरूरत होती।

(4) निजी अस्पतालों जैसी संस्थाओं को भी पुराने नोट स्वीकारने की अनुमति दी गयी होती तो लोगों को राहत रहती। बहुत से लोग अस्पतालों के खर्चे को लेकर परेशान रहे।

आलोचनाओं का दौर

अस्तु जो होना था हो चुका है। किसी योजना के कार्यान्वयन में भूल-चूक हो ही सकती है। उतने भर से योजना को निरर्थक नहीं कहा जा सकता।

टीवी चैनलों पर जो देखने-सुनने को मुझे मिला उससे यही लगा कि अधिकांश आम जनों ने सरकार के इस कदम को अच्छा कदम बताया। यह भी सभी ने स्वीकारा कि दो-चार दिनों की परेशानी अवश्य सबको हो रही है। कुछ की परेशानी अवश्य ही गंभीर रही और अभी है। अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए और शादी-व्याह की तैयारी में जुटे लोगों को बेहद परेशानी हो रही है यह भुक्तभोगी कहते हुए सुने जा रहे हैं। योजना की सही जानकारी न होने के कारण किसी ने दम तोड़ दिया या आत्महत्या कर ली ऐसी पीड़ाप्रद खबरें भी सुनने को मिल रही हैं।

जनसामान्य से हटकर जिस प्रकार की आलोचनाएं विपक्षी राजनेताओं की हैं वह मुझे हैरान करती है:

माननीय मुलायम जी चाहते थे कि नोटों का प्रचलन बंद होने की बात हफ़्ता भर पहले बता देना चाहिए था ताकि लोग अपना इंतजाम कर सके होते। इंतजाम ही न कर पाते इसी के लिए तो 6 माह से चल रही कवायद को गुप्त रखा गया था यह बात उनकी समझ में नहीं आ रही।

बहन मायावती जी क्या बोल रहीं है यह शायद वह स्वयं नहीं जानतीं। कहती हैं भाजपा ने सौ सालों का इंतिजाम कर लेने के बाद दूसरों को परेशानी में डालने के लिए ऐसा कदम उठाया है। वह क्या यह भी समझती हैं कि सौ साल के इंतिजाम का मतलब क्या है? क्या कोई ऐसी व्यवस्था कर सकता है? क्या वह बता सकती हैं उन्हें यह बात कब और कैसे पता चलीं? क्यों नहीं उन्हेंने समय पर भंडाफोड़ किया योजना का और भाजपा के इरादों का? राष्ट्रीय स्तर की राजनेत्री होते हुए उन्हें अनर्गल प्रलाप नहीं करना चाहिए।

केजरीवाल जी के कहने ही क्या! वे सोचते हैं कि मोदी न होते तो वही देश के प्रधानमंत्री होते। बस मोदी जी ही उनकी राह के रोड़ा हैं। उनकी लड़ाई बस मोदी और केवल मोदी से है। इसलिए उन्हें रात-दिन सोते-जागते केवल मोदी की ही बातें सूझती हैं। वे कहते कि तीन माह पहले भाजपा के लोगों का कालाधन ठिकाने लगा दिया गया और उसके बाद दूसरों की परेशानी बना यह योजना सामने लाई गयी। सितंबर तक बैंकों में करोड़ों जमा इसीलिए हुए। वे यह भूल गये कि पैसा जमा करने की योजना तो सरकार सबके लिए थी केवल भाजपा के लोगों के लिए नहीं थी। आगे क्या होगा यह केजरी जी भी नहीं जानते होंगे। लगता है मायावती जी की तरह क्या हो रहा है यह उन्हें भी मालूम था, फिर भी वे इस दौरान चुप्पी साधे रहे। आश्चर्य है।

श्री राहुल गांधी को “पप्पू” की उपाधि ऐसे ही नहीं मिली है। पुराने नोट बदलवाने में कितनी परेशानी “गरीब” लोगों को हो रही है इसका वे बखान नहीं कर पा रहे। लोगों की इस परेशानी में शरीक होने के लिए वे भी बैंक पहुंच गये। वे यह भूल गये कि उनकी सुरक्षा में लगे कर्मी जनता की परेशानी में इजाफा ही कर रहे होंगे। गरीबों को परेशानी तो पग-पग पर होती है, वे कहां-कहां पहुंचते हैं पता नहीं।

इधर सुश्री ममता बनर्जी ने भी अपनी भड़ास निकाली है। वे कहती हैं कि यह योजना गरीबों के विरुद्ध है। लोगों की रोजी-रोटी खत्म हो गयी है, कामधंधे चौपट हो रहे हैं, इत्यादि-इत्यादि।

     उक्त राजनेता तथा अन्य नेता सब मुहिम को गरीब विरोधी मान रहे है। गरीबॊ को होने वाली अड़चन के लिए सब चिंतित है। इस देश में है कोई राजनेता जो गरीबों की चिंता न करता हो। गरीबों की चिंता में वे कितने दुबला रहे हैं यह तो इन लोगों की काया से स्पष्ट जाता है। ये गरीब ही तो हैं जिन पर इनके और इनके दलों का अस्तित्व टिका है। गरीब न हों तो यह किसकी सेवा करेंगे? इसलिए जय गरीब, जय गरीबी। गरीबी, तू कभी छोड़ के न जाना।

     गरीबों की चिंता करने वाले ये नेता बता सकते हैं कि गरेबओं के बच्चों के लिए बने सरकारी स्कूलों की दशा क्या है? अस्पतालों में उनका इलाज डाक्टर करता है या अन्य कर्मी? गरीबों के साथ इन नेताओं के अधीन पुलिस का क्या व्यवहार होता है यह इनको पता है क्या? रेलगाड़ियों के जनरल डिब्बी में वे कैसे ठुंसे रहते हैं इस बात सुध ली कभी इन्होंने? ऐसे तमाम सवालों का इनके पास है कोई जवाब?

इस बार परेशानी इन नेताओं को हो रही है और बहाना कर रहे हैं गरीबों की दिक्कतों का। वाह!

अपने देश में विपक्ष एक ही बात पर जोर देता है: “हम विपक्षी हैं। हमारा कर्तव्य है कि पक्ष जो कहे-करे उसे कोसते फिरें। हम विकल्पों की बात नहीं करेंगे।”

     अपने-अपने दल के शीर्षस्थ ये नेता स्वयं कालेधन के विरुद्ध क्या कदम उठाते अगर उनको यह मौका मिलता इस सवाल का जवाब कोई नहीं देना चाहेगा, क्योंकि उनकी कोई योजना ही नहीं। लगता है वे यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं।

     राहुल जी को इस विषय में कुछ नहीं कहना चाहिए, क्योंकि आजतक उन्हीं की पार्टी सरकार चला रही थी। – योगेन्द्र जोशी