लोकसभा चुनाव 2019 – एक अनूठे ध्रुवीकरण की राजनीति

यों तो मैंने 1957 एवं 1962 के चुनाव देखे हैं (क्रमशः करीब 10 एवं 15 साल की उम्र में), लेकिन लोकतंत्र तथा चुनावों की समझ मैंने 1967 के चुनाव और उसके बाद ही अर्जित की। 1977 के चुनावों तक मैं शायद एक पंजीकृत मतदाता भी बन चुका था। उस समय के चुनावों की परिस्थिति एवं घटनाक्रम मुझे कुछ हद तक याद हैं। उस चुनाव से इस वर्ष के लोकसभा चुनाव की तुलना और संबंधित टिप्पणी मैं अपनी याददास्त पर निर्भर करते हुए कर रहा हूं। वैसे विस्तृत एवं ठीक-ठीक जानकारी अंतरजाल पर मिल ही जाएगी।

इस बार के लोकसभा चुनाव इस अर्थ में दिलचस्प हैं कि इसमें अपने किस्म के एक अनोखे ध्रुवीकरण की राजनीति देखने को मिल रही है। ध्रुवीकरण न जाति के आधार पर है और न ही धर्म अथवा क्ष्रेत्र के आधार पर। यह ध्रुवीकरण है प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध।

जब से क्ष्रेत्रीय दलों का आविर्भाव देश में हुआ और अपने बल पर सरकार बना सकने की कांग्रेस पार्टी की हैसियत समाप्त हो गई, विविध प्रकार के गठजोड़ देखने को मिलने लगे। ध्रुवीकरण की बातें पहले भी होती रही हैं, खासकर मुस्लिम समुदाय को लेकर, लेकिन व्यापक स्तर का ध्रुवीकरण कभी पहले हुआ हो ऐसा मुझे याद नहीं आता एक मामले को छोड़कर। ध्रुवीकरण का वह मामला था 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरुद्ध। लेकिन तब के ध्रुवीकरण और इस बार के ध्रुवीकरण में उल्लेखनीय अंतर है। इस अंतर को समझने के लिए उस काल की राजनीतिक परिस्थिति पर एक नजर डालने की आवश्यकता होगी।

मेरे समान उम्रदराज लोगों को याद होगा कि 1960 के दशक के लगभग मध्य में जनसंख्या नियंत्रण की बात चली थी (कांग्रेस राज में)। लाल त्रिकोण (▼) और “हम दो हमारे दो” के विज्ञापन यत्रतत्र देखने को मिलते थे। योजना के परिणाम भी ठीक होंगे यह उम्मीद बनने लगी थी। लेकिन 1972 के चुनावों के बाद इस परिवार नियोजन कार्यक्रम का हस्र दुर्भाग्यपूर्ण रहा। कैसे? देखें –

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध एवं बांग्लादेश के “जन्म” के बाद कांग्रेस की स्थिति बहुत अच्छी रही। उसे 1972 के चुनावों में उल्लेखनीय सफलता मिली। किंतु देश का दुर्भाग्य कि उसी समय इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी एक गैर-संवैधानिक शक्ति के तौर पर उभरे। इंदिराजी की एक बड़ी भूल थी कि उन्होंने संजय को सरकारी तंत्र में हस्तक्षेप करने से रोका नहीं। संजय को विद्याचरण शुक्ल, नारायण दत्त तिवारी आदि जैसे नेता चाटुकार के रूप में मिल गये। संजय ने सरकारी कामकाज में दखलंदाजी शुरू कर दी। मैं मानता हूं कि संजय के इरादे बुरे नहीं थे किंतु वह अति-उत्साह एवं उतावली में थे देश को तेजी से आगे बढ़ाने में। इसके लिए विभिन्न विभागों को कठोर कदम उठाने के निर्देश दिए जाने लगे। परिवार नियोजन संजय गांधी का अहम मुद्दा था और उसे लेकर जोर-जबर्दस्ती तक होने लगी। अन्य अनेक कारण भी थे जिससे लोगों के मन में धीरे-धीरे आक्रोश पनपने लगा। उसी बीच छात्र आंदोलन भी चल पड़ा जिसकी अगुवाई जयप्रकाश नारायनजी ने की। तब इंदिराजी ने असंवैधानिक तरीके से आपात्काल घोषित कर दिया। लोगों की धर-पकड़ शुरू हुई। कुछ विरोधियों को जेल में डाला गया तो कुछ भूमिगत हो गए। 1977 में चुनाव होने थे। संजय चाहते थे कि आपात्काल को लंबा खींचा जाए, लेकिन इंदिरा जी ने चुनाव घोषित कर ही दिए (छःठी लोकसभा)।

ये उस काल का विस्तृत एवं सटीक विवरण नहीं है, किंतु इससे वस्तुस्थिति का मोटा-माटी अंदाजा लगाया जा सकता है। मैं तब लगभग 30 वर्ष का था।

उस समय जनता काफी हद तक इंदिराजी की विरुद्ध हो गई। प्रायः सभी राजनीतिक दल इंदिरा जी के विरुद्ध लामबंद हो गये। उन सभी ने मिलकर कांग्रेस के विरुद्ध “जनता पार्टी” के नाम से नया दल बना डाला और उम्मीद के अनुरूप चुनाव में उन्होंने कांग्रेस को करीब डेड़ सौ सीटों पर समेट दिया। (जनता दल 298 सीट, कांग्रेस 153 सीट)

दुर्भाग्य से अपने आंतरिक विरोधों के कारण “जनता” सरकार मुश्किल से दो-ढाई साल चली और 1979-80 में फिर चुनाव हुए (सातवीं लोकसभा) जिसमें इन्दिराजी 353 सीटों की “बंपर” जीत के साथ लौटीं।

इस बात पर ध्यान दें कि कांग्रेस/इंदिराजी के विरुद्ध बनी “जनता” पार्टी अधिक दिनों तक टिकी नहीं और अपने घटकों में बिखर गई। क्यों? क्योंकि इस पार्टी का गठन परस्पर बेमेल राजनैतिक विचाराधारा वाले घटक दलों ने भेदभाव मिटाकर किया था महज कांग्रेस को हटाने के लिए। उदाहरणार्थ उसमें बामपंथी दल भी थे और भाजपा (तब जनसंघ) जैसी दक्षिणपंथी भी। लेकिन आपसी विरोध जल्दी ही सतह पर आ गया और पार्टी घटकों में बंट गई।

आज 2019 के चुनावों में फिर से कुछ-कुछ वैसी ही राजनैतिक स्थिति देखने को मिल रही है। तब (1977 में) मुद्दा था “इंदिरा हटाओ“, और आज मुद्दा है “मोदी हटाओ”। लेकिन तब और अब में महत्वपूर्ण अंतर हैं –

∎ (1) 1977 में अधिकांश दल महागठबंधन के बदले एक पार्टी के तौर पर इंदिराजी के विरुद्ध खड़े हो गए। पार्टी बनाने का मतलब पूर्ववर्ती अस्तित्व भुला देना। इस बार क्षेत्रीय स्तर पर छोटे-बड़े गठवंधन बने हैं। महागठबंधन अभी नहीं बना है। बनेगा या नहीं; यदि बना तो उसका स्वरूप क्या होगा यह चुनाव-परिणाम पर निर्भर करेगा। गठबंधन का मतलब है स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखकर एक साथ शासन चलाने की मंशा।

∎ (2) उस दौर में इंदिराजी का विरोध नेताओं तक ही सीमित नहीं था। जनता भी आक्रोषित थी और जनांदोलन के रूप में उसका विरोध व्यक्त हुआ था। इस बार विरोध नेताओं तक ही सीमित है। जनता शान्त है और वह क्या सोचती है यह स्पष्ट नहीं। उनकी सोच चुनाव-परिणामों से ही पता चलेगा।

∎ (3) तब देश में आपात्काल वस्तुतः घोषित हुआ था, जिससे पीड़ित होकर जनता इंदिराजी के विरुद्ध हो गई थी। इस बार आपात्काल नहीं है भले ही विपक्षी अघोषित आपात्काल की बात करते हैं। जनता उनकी बात से सहमत है ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिखता।

∎ (4) 1970 के दशक के उस काल में राजनीति में इस कदर सिद्धांतहीनता नहीं थी। लेकिन आज के दौर में नेता रातोंरात एक विचारधारा त्यागकर एकदम विपरीत विचारधारा स्वीकारते हुए दलों के बीच कूद-फांद मचा रहे हैं।

∎ (5) वैचारिक मतभेद राजनीति में सदा से रहे हैं, किंतु राजनेताओं में एक दूसरे के प्रति सम्मान का अभाव उस दौर में नहीं था। उनकी भाषा काफी हद तक शिष्ट और संयत रहती थी। लेकिन मैं देख रहा हूं कि इस चुनाव में भाषायी मर्यादा जैसे लुप्त हो चुकी है। समाचार माध्यमों से ऐसी जानकारी मिल रही हैं और निर्वाचन आयोग की कुछएक के अमर्यादित व्यवहार के विरुद्ध कदम भी उठा चुका है।

∎ (6) मुझे जितना याद आता है जातीयता और धार्मिकता के आधार पर खुलकर वोट मांगने का चलन 1970 के दशक तक नहीं था। अब तो अनेक नेता अलग-अलग जातीय समुदायों के प्रतिनिधि के तौर पर खुलकर राजनीति कर रहे हैं।

1977 के इंदिरा-विरोध में हुए और इस बार 2019 के मोदी-विरोध में हो रहे ध्रुवीकरण में उक्त प्रकार के अंतर मेरे देखने में आ रहे हैं।

मुझे लगता है कि जब 1977 के गंभीर राजनीतिक परिदृश्य में चुनाव के बाद टिकाऊ सरकार नहीं बन सकी तो इस बार क्या उम्मीद की जा सकती है। अभी तो राष्ट्रीय स्तर पर ही महागठबंधन नहीं बन सका है| महत्वाकांक्षाओं के ग्रस्त क्षेत्रीय क्षत्रप क्या किसी एक का नेतृत्व स्वीकार कर पाएंगे? मोदी के विरुद्ध बहुमत हासिल हो जाए तो भी सरकार गठन की पेचदगी सुलझा पाएगा कोई?

मुझे अपने फल-विक्रेता की बात याद आती है। उसने बारचीत में कहा था, “सा’ब हम मोदी के बदले विपक्ष को वोट तो दे दें, लेकिन ये तो बताइए कि ये सरकार बना भी पाएंगे क्या?” – योगेन्द्र जोशी

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क्या नेरेन्द्र मोदी फिर से प्रधान मंत्री बनेंगे? लगता तो ऐसा ही है!  

आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट कर दूं —

मैं वाराणसी का वरिष्ठ (उम्र 70+) मतदाता हूं। मतदान छोड़ता नहीं किंतु किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करता, मोदीजी के पक्ष में भी नहीं। दरअसल मैं नोटा का प्रबल पक्षधर हूं और उसकी वकालत करता हूं। मैंने एक वयस्क नागरिक के रूप में 1969 और उसके बाद के चुनाव देखे हैं और पिछले दो-तीन दशकों से लोकतांत्रिक प्रणाली में गंभीर और तेजी से गिरावट महसूस करने लगा हूं। फलतः लोकतंत्र के मौजूदा मॉडल से मेरा मोहभंग हो चुका है। किस-किस तरीके की गिरावट देख रहा हूं इसका विवरण मैं यहां नहीं दे सकता, क्योंकि इस आलेख का विषय वह नहीं है।

मैंने पिछले कुछ दिनों जिज्ञासावश यह जानने-समझने की कोशिश की कि मोदीजी के सत्ता में लौटने की संभावना कितनी है। मेरा अनुमान या आकलन अलग-अलग मौकों तथा स्थानों पर आम लोगों से हुई बातों पर आधारित है। मेरी बात बमुश्किल 10-15 लोगों से हुई होगी, जो सांख्यिकीय (statistical) दृष्टि से अपर्याप्त है। फिर भी मुझे जो लगा वह कुछ हद तक माने तो रखता ही है।

मैं अपने अनुभवों को कालक्रमबद्ध (chronological order) तरीके से पेश कर रहा हूं —

(1)

दो-ढाई महीने पहले मेरे पड़ोस में एक सज्जन ने अपने नये मकान में प्रवेश किया। उस अवसर पर उन्होंने गृह-प्रवेश के पारंपरिक पूजा-सह-भोज का आयोजन किया था, जिसमें मुझे भी आमंत्रित किया गया था। उस मौके पर उनके परिवारी जनों के अलावा गांव से भी कुछ लोग आये हुए थे। उनके यहां बैठे हुए कुछ लोगों के बीच राजनीति और आगामी लोकसभा चुनावों की चर्चा हो रही थी। मैं उन लोगों की बातों को ध्यान से सुन रहा था। सभी एक बात पर सहमत दिखे, वह यह कि लोग (यानी विपक्ष के लोग) बिलावजह मोदीजी के पीछे पड़े हैं। मोदीजी को चुनाव जीतना चाहिए। मैंने सुनिश्चित करने के लिए किसी एक से पूछ लिया, “लगता है आप लोग मोदीजी को वोट देने की सोच रहे हैं। आपके गांव में क्या मोदीजी के पक्ष में माहौल है?”

उत्तर था, “हां लगभग सभी इसी मत के हैं”। उन लोगों से बातें तो काफी विस्तार से हुईं किंतु उतना सब मुझे न याद है और न उतना सब प्रस्तुत करने की जरूरत है।

(2)

विगत जनवरी के अंतिम सप्ताह में मेरी पत्नी एवं मैं लखनऊ गए थे एक वैवाहिक समारोह में सम्मिलित होने के लिए। पहले दिन वैवाहिक कार्यक्रम-स्थल पर रेलवे स्टेशन से जाने और दूसरे दिन वापस स्टेशन आने के लिए हमने ऊबर (Uber) टैक्सी-सेवा का प्रयोग किया था। रास्ते की एकरसता से बचने के लिए दोनों बार हमने संबंधित टैक्सी-चालक से बातचीत की और स्वाभाविक तौर पर प्रासंगिक विषय – चुनावों – की चर्चा की। चर्चा मोदीजी के दुबारा प्रधानमंत्री बनने परकेंद्रित थी। वे दोनों मोदीजी के प्रबल समर्थक निकले। वे कह रहे थे “मोदीजी जो कर रहे ठीक कर रहे हैं। उनकी योजनाओं का लाभ तुरंत लोगों को मिले यह हो नहीं सकता, कुछ समय लगेगा ही। लोगों को धैर्य रखना चाहिए।”

वे मोदीजी की ईमानदारी एवं नीयत के क़ायल थे। इस बात पर दोनों का ही जोर था कि मोदीजी अपने घर-परिवार के लिए तो वह सब नहीं कर रहे हैं जो कि आजकल सभी दलों के मुखिया कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह रही कि रात्रि द्वीतीय प्रहर में जब हम वाराणसी वापस पहुंचे और ऑटो-रिक्शा से अपने घर वापस आने लगे तो ऑटो-चालक की मोदीजी के बारे में कमोबेश वही राय थी जो लखनऊ के टैक्सी चालकों की थी। उनके विचार रखने और शब्दों के चयन में फर्क स्वाभाविक था। कुल मिलाकर हमें लगा कि वे मोदीजी की कार्यप्रणाली ठीक बता रहे थे और उनकी सत्ता में वापसी के प्रति आश्वस्त थे।

(3)

(वाराणसी) उक्त घटना के दो-तीन रोज के बाद मैं अपने दर्जी के पास से कपड़े लेने गया। दर्जी महोदय उस समय खास व्यस्त नहीं थे और कोई अन्य ग्राहक उस समय वहां नहीं था। ऐसे मौकों पर मैं दुकानदार से थोड़ी-बहुत गपशप भी कर लेता हूं। उसी रौ में मैंने दर्जी से चुनाव की बात छेड़ी और पूछा, “इस बार किसको जिता रहे हैं वाराणसी से?” (मोदीजी का निर्वाचन क्षेत्र था 2014 में; और इस बार भी रहेगा ऐसी उम्मीद है।)

जवाब सीधा एवं सपाट था, “मोदीजी जीतेंगे और फिर से प्रधान मंत्री बनेंगे।”

“लेकिन मोदीजी पर विपक्ष बुरी तरह हमलावर है जो कहता है कि नोटबंदी तथा जीएसटी (GST) ने व्यापार चौपट कर दिया और श्रमिक बेरोजगार हो गए, इत्यादि-इत्यादि।” मैंने विपक्ष का तर्क सामने रखा।

“देखिए आरोप लगाना तो विपक्ष की मजबूरी है। लेकिन नोटबंदी एवं जीएसटी से कुछ समय परेशानी अवश्य हुई होगी। परंतु यह भी समझिए कि दीर्घकालिक देशहित के लिए कष्ट तो सहना ही पड़ेगा। … सबसे बड़ी बात यह है कि मोदीजी यह सब अपने परिवार के लिए, भाई-बंधुओं के लिए नहीं कर रहे न? उनके परिवारीजन अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं और मोदीजी से किसी प्रकार का लाभ लेने की नहीं सोचते हैं। ये राजनेता तो सबसे पहले अपना घर भरते हैं। देखिए कुछ तो विधानसभा, लोकसभा में सबसे पहले अपने भाई-बहनों, चाचा-भतीजों को ही पहुंचाते हैं। ठीक है क्या? मोदी ऐसा तो नहीं करते न?”

दर्जी महोदय राजनीतिक तौर पर काफी सजग थे और वस्तुस्थिति का ठीक-ठीक आकलन करने की कोशिश कर रहे थे।

(4)

फ़रवरी माह के अंतिम और मार्च के प्रथम सप्ताह हम राजस्थान भ्रमण पर निकले थे। हम दोनों को मिलाकर कुल छ: जने थे, सब के सब वरिष्ठ नागरिक। चुनाव की बात करना हम वहां भी नहीं भूले। जैसलमेर में मेरी पत्नी और मैं मिठाई की एक दुकान में गये। जैसा मुझे याद है दुकान के बोर्ड पर लिखा था “पालीवाल मिष्ठान्न”. खरीद-फरोख्त के साथ थोड़ी-बहुत बात भी हो गई। “इस बार केन्द्र में किसकी सरकार बनवा रहे हैं?” हमने सवाल पूछा।

दुकान के मालिक का त्वरित उत्तर था, “मोदीजी वापस आएंगे। और भला है ही कौन? ये लोग मिलकर सरकार चला पाएंगे?”

“लगता है आप मोदी के प्रबल समर्थक हैं।” हमने टिप्पणी की।

उन सज्जन का सीधा उत्तर था “हम तो भाजपा वाले हैं, वोट उसी को देंगे।”

बातचीत के बाद हम आगे बढ़ गए। एक फल वाले के ठेले पर हम रुक गए कुछ फल खरीदने के लिए। फल वाले से यों ही पूछ लिया, “कुछ ही दिनों में देश में चुनाव होने हैं। चुनाव में दिलचस्पी लेते हैं कि नहीं?”

फल वाले ने कहा, “दिलचस्पी क्यों नहीं लेंगे भला? वोट भी डालेंगे; देश के भविष्य से जुड़ा है चुनाव तो।”

“आप लोगों ने तो पिछले प्रादेशिक चुनावों में कांग्रेस के पक्ष में वोट डाला था। इस बार भी कांग्रेस के प्रत्याशी को वोट देंगे न?” हमने टिप्पणी की।

“तब वसुंधराजी से नाखुशी थी प्रदेशवासियों को, किंतु मोदीजी से नहीं। इस बार उन्हीं के पक्ष में वोट पड़ेंगे।

(5)

राजस्थान पर्यटन के दौरान हम जोधपुर भी गये थे। वहां मैं इस विषय पर अधिक लोगों से बातचीत नहीं कर पाया। परंतु एक व्यक्ति, जो कपड़ों की सिलाई की दुकान चला रहे थे, और उनके साथी से बातें अवश्य हुईं। उनकी दुकान स्टेशन के सामने की सड़क पर 300-400 मीटर की दूरी पर थी। वहां मुझे ऐसे सज्जन मिले जो मोदीजी के घोर विरोधी थे। नोटबंदी एवं जीएसटी (GST) को लेकर वे गुस्से में थे और कह रहे थे कि मोदी ने गरीबों की रोजी-रोटी छीन दी। ऐसा इलजाम विपक्ष लगाता ही रहा है।

उन सज्जन ने मुझसे मेरा परिचय जानना चाहा । बदले में मैंने भी उनसे उनका परिचय ले लिया। संयोग की रही कि उनका जातिनाम भी मोदी ही था। मेरी आम धारणा यह रही है कि अधिकतर भारतीय अपनी जाति के लोगों के प्रति कोमल भाव रखते हैं। लेकिन यहां पर उल्टा ही हो रहा था।

जैसलमेर एवं जोधपुर में हम लोगों को मरुभूमि के रेतीले टीलों (sand dunes) पर जीप से घूमने का मौका मिला (वहां का प्रमुख आकर्षण)। दोनों ही बार हमें मोदी-विरोध सुनने को मिला। उन जीप-चालकों से अधिक बातें करने पर पता चला कि वे मुस्लिम समुदाय से हैं। हमने महसूस किया कि धार्मिक पृष्ठ्भूमि मोदीजी के संदर्भ में अहमियत रखती है। ऐसा अनुभव अन्यत्र भी हमें हुआ।

(6)

हम लोग जयपुर भी घूमने गए थे। वहां मुझे चुनावों के बारे में किसी से बातें करने का मौका नहीं मिला। जयपुर के दर्शनीय स्थलों को दिखाने वाले टैक्सी-चालक से अवश्य बातें हुईं। उसने बताया कि मिर्जापुर (या सोनभद्र, याद नहीं) में उसकी ससुराल है और वाराणसी से खास लगाव रखता है। उसने मोदीजी के पक्ष में ही अपनी राय रखी। संयोग से वह हिन्दू निकला।

(7)

(वापस वाराणसी) एक दिन मैं वाराणसी में अपने घर से बमुश्किल तीन-चार सौ मीटर दूर  प्रातः से दोपहर तक लगने वाली सट्टी में फल-सब्जी खरीदने गया। (सट्टी = थोक एवं फुटकर फलों एवं सब्जियों का बाजार।) मैं वर्षों से हफ़्ते में दो-तीन बार इस कार्य के लिए जाया करता हूं। कुछ फुटकर विक्रेताओं से मेरा अच्छा-खासा परिचय है और मैं उनसे आम ग्राहकों की तरह पेश नहीं आता, बल्कि उनसे थोड़ी-बहुत गुफ्तगू भी कर लेता हूं। उन्हीं में से एक से मैंने पूछ लिया, “कहिए, आपके ’मोदीजी’ के क्या हाल हैं? इस बार भी सरकार बना पाएंगे क्या?”

प्रत्युत्तर में उसने मुझसे ही सवाल कर दिया, ” आप ही बताइए किसको वोट दें? विकल्प कहां है? विपक्ष के नेता मिलकर सरकार बना पाएंगे क्या? बना भी लें तो चला पाएंगे? कितनी टिकाऊ होगी उनकी सरकार? सबके आपने-अपने स्वार्थ हैं।”

सब्जी विक्रेता की बातों में स्पष्ट संकेत था। मोदीजी को वोट न दें तो किसे दें?

निष्कर्ष –

अब चुनाव घोषित हो चुके हैं, दलों की घोषणाएं मतदाताओं को सुनने को मिल रही हैं। कांग्रेस गरीबों को 72 हजार रुपये सालाना देने का वादा कर रही है। ऐसे वादे मरदाताओं के विचार बदल सकते हैं। परिस्थितियां बदलने पर चुनाव के परिणाम भी बदलेंगे ही।

फिर भी मुझे लगता है कि कांग्रेस पार्टी पर्याप्त सीटें नहीं जीत पाएगी। कोई चमत्कार हो जाए तो बात अलग है। अन्य दलों का देशव्यापी जनाधार है नहीं। प्रायः सभी क्षेत्रीय (या एक प्रकार से क्षेत्रीय) दल हैं। उनमें परस्पर स्थायी सहमति एवं एकता दिखाई नहीं देती। भविष्य में सहमति बन पाएगी क्या? मुझे लगता है मोदीजी सत्ता में लौटेंगे। हो सकता है रा.लो.ग. (NDA) को बहुमत न मिले, फिर भी जोड़तोड़ करके सरकार बना ली जाएगी।

अवश्य ही मोदीजी की सत्ता में वापसी को कुछ लोग देश का दुर्भाग्य कहेंगे। – योगेन्द्र जोशी

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2 अक्तूबर – महात्मा गांधी जयन्ती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस

गांधी एवं शास्त्री जयंती

आज गांधी जयन्ती है – 1969 में जन्मे महात्मा गांधी यानी बापू का 150वां जन्मदिन। इस दिन के साथ ही उनके जन्म का 150वां वर्ष आरंभ हो रहा है। संयोग से यही दिन देश के दूसरे प्रधान मंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन रहा है (जन्मवर्ष 1904)। किंतु २ अक्टूबर का सार्वजनिक अवकाश एवं उस दिन के तमाम कार्यक्रम बापू को ही केन्द्र में रखकर आयोजित होते रहे हैं। लगे हाथ शास्त्रीजी का भी जिक्र कर लिया जाता है और उनको श्रद्धांजली अर्पित की जाती है। गांधी जी के सम्मान में इस दिन को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया हुआ है।

केन्द्र सरकार ने इस 150वें वर्ष को सोद्देश्य तरीके से मनाने का कार्यक्रम बनाया है और इस कार्य हेतु एक कार्यकारिणी समिति का गठन किया है। देश के विभिन्न राज्यों की सरकारें और केन्द्र सरकार के विभिन्न महकमे इस वर्ष को अपने-अपने तरीके से मनाने के कार्यक्रम बना रहे हैं। उदाहरणार्थ रेलवे मंत्रालय इस मौके पर अपनी रेलगाड़ियों के डिब्बों में “स्वच्छ भारत” का प्रतीक (लोगो) प्रदर्शित करेगा। इसके अतिरिक्त मंत्रालय साफ-सफाई, अहिंसा, सामुदायिक सेवा, सांप्रदायिक सौहार्द्र, अस्पृश्यता-निवारण, तथा महिला-सशक्तिकरण का व्यापक स्तर पर संदेश अपनी गाड़ियों के माध्यम से देने की योजना बना रहा है। (देखें इकनॉमिक टाइम्ज़ की खबर)

गांधी जन्मदिन एवं जन्मवर्ष सरकारी स्तर पर कैसे बनाए जाएंगे इसकी विस्तृत जानकारी न मुझे है और न ही उसकी चर्चा करने का मेरा इरादा है। जन्मदिवस की सार्थकता क्या है और आम नागरिक उसको कितनी गंभीरता से लेते हैं मैं इस पर अपनी टिप्पणी पेश करना चाहता हूं।

दिवसों की बढ़ती संख्या

अगर आप 40-50 वर्ष पूर्व की बात करें तो पाएंगे कि विभिन्न प्रकार के दिवसों की संख्या तब इतनी नहीं थी जितनी आज है। समय के साथ नये-नये दिवस घोषित होते रहे हैं कुछ हमारे राष्ट्रीय दिवस जिनमें से कई तो “महापुरुषों” के जयंतियों के नाम पर हैं, और कुछ राष्ट्र संघ के द्वारा घोषित किए गए हैं। अपने देश से जुड़े दो अंतरराष्ट्रीय दिवस तो पिछले 11 वर्षों में अस्तित्व में आए हैं। ये हैं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस, 2 अक्टूबर, और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस, 21 जून, जो राष्ट्र संघ द्वारा क्रमशः 2007 तथा 2015 में घोषित किए गए।

मैं जब इन तमाम दिवसों के बारे में सोचता हूं तो मुझे हर किसी दिवस की सार्थकता नजर नहीं आती। वे सार्थक होंगे इस विचार से घोषित किए गए होंगे, लेकिन व्यवहार में वे सार्थक हो पाए हैं इसमें मुझे शंका है। कुछ दिवस तो पारंपरिक रूप से सदियों से मनाए जाते रहे हैं जो समाज के विभिन्न समुदायों (विशेषत: धर्म-आधारित) की आस्थाओं से जुड़े हैं और त्योहारों का रूप ले चुके हैं जैसे अपने देश में राम-नवमी, कृष्ण-जन्माष्टमी, महावीर जयंती एवं नानक जयंती आदि मनाए जाते हैं। ये दिवस कोई खास संदेश देने के लिए मनाए जाते हों ऐसा मैं नहीं समझता।

अपने देश में स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त), गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) एवं गांधी जयंती (2 अक्टूबर) राष्ट्रीय अवकाश एवं पर्व के तौर पर घोषित हैं। सैद्धांतिक तौर यह माना जाएगा कि ये दिवस मात्र छुट्टी मनाने और कुछएक रस्मी कार्यक्रमों के आयोजन तक सीमित नहीं हैं बल्कि ये नागरिकों को उनके कर्तव्य-निर्वाह का स्मरण कराते हैं। लेकिन क्या नागरिकवृंद उस संदेश पर ध्यान देते हैं और क्या उस संदेश के अनुसार चलने का प्रयास करते हैं। अवश्य ही इन अवसरों पर विभिन्न सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं में अनेकानेक आदर्शों की बात की जाती है और जनसमुदाय को अपने जीवन में उन्हें अपनाने का उपदेश दिया जाता है। मुझे लगता है कि आदर्शों की बात करना इन मौकों पर वक्ताओं के लिए विवशता होती है। वे स्वयं उन आदर्शों को – आंशिक तौर पर ही सही – अपनाने की इच्छा नहीं रखते इस बात को श्रोता भली भांति समझते हैं, और श्रोताओं की इस समझ को वक्ता भी जान रहा होता है। किंतु रस्मअदायगी चलती रहती है।

बतौर अहिंसा दिवस के गांधी जयंती की सार्थकता

यों तो गांधी दिवस इस देश में एक राष्ट्रीय अवकाश के तौर पर दशकों से मनाया जा रहा है और साथ में इस दिन की रस्मअदायगी भी चलती आ रही है। किंतु महात्मा गांधी के अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता वाले व्यक्तित्व के चलते इसका महत्व देश तक सीमित नहीं रह गया है। जब से इस दिन को राष्ट्र संघ द्वारा अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया गया है इसका महत्व इस देश के बाशिंदों के लिए खास तौर पर बढ़ गया है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जिस देश से गांधी जुड़े रहे यदि वहीं के लोग गांधी के विचारों को भुला दें तो बाहरियों के लिए हम कितने सम्माननीय रह सकते हैं?

मेरे मन में एक सवाल उठता है कि क्या गांधी दिवस के अहिंसा दिवस बन जाने से लोग अहिंसा-भाव के प्रति प्रेरित हो रहे हैं? यहां पर याद दिलाना चाहता हूं कि अहिंसा एवं सहिष्णुता एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं किंतु दोनों में घनिष्ठ संबंध है। जहां सहिष्णुता होगी, क्षमाशीलता होगी, दूसरों के प्रति संवेदना होगी, वहीं अहिंसा की भावना प्रबल होगी। किंतु जीवन के 70 वसंत पार करते-करते मैं यही अनुभव कर रहा हूं कि समय के साथ देश में असहिष्णुता बढ़ती गई है। दूसरों के प्रति अपराध करने के विचार प्रबल होते जा रहे हैं। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण तो संसद तथा विधानसभाओं में आपराधिक छवि के जन-प्रतिनिधियों की दिनबदिन बढ़ती संख्या है, जिस तथ्य को उच्चतम न्यायालय एवं निर्वाचन आयोग, दोनों, संज्ञान में ले चुके हैं, परंतु लोकतंत्र के पहरेदार हमारे नेता इसे महत्वहीन मानते आ रहे हैं। क्या यह सब गांधी के विचारों के अनुरूप है? तो कैसे मान लें कि लोकतंत्र के शासकीय पक्ष को चलाने वाले गांधी के विचारों के प्रति श्रद्धा रखते हैं।

क्या ऐसा नहीं लगता कि गांधी जयंती अपनी अहिंसा संबंधी अर्थवत्ता खोती जा रही है? क्या अहिंसा का विचार केवल मुख से बोले जाने वाले कथनों तक ही सीमित नहीं होता जा रहा है? मेरा मानना है देश में अहिंसा की भावना को महत्व न देने वाले नागरिकों की संख्या कम नहीं है। इसका जीता-जागता प्रमाण है आजकल अक्सर सुनने में आने वाली “मॉब-लिंचिंग” (भीड़-कृत हत्या) की घटनाएं। किसी बात पर किसी मनुष्य पर किसी ने छोटे-बड़े अपराध का शक जताया नहीं कि भीड़ इकट्ठी हो जाती है और “मारो-मारो” के नारे के साथ उस असहाय को मौत की सजा दे देती है। शक के घेरे में आया व्यक्ति अपराधी हो सकता है तो भी भीड़ अपना निर्णय सुना दे यह सर्वथा निंद्य और अन्यायपूर्ण माना जाएगा। ऐसे मौकों पर कोई एक या दो व्यक्ति विवेक खो बैठें तो समझ में आता है। लेकिन जब दो-चार नहीं बल्कि दर्जनों लोग उस कुकृत्य में जुट जाएं तो मैं यही कहूंगा कि पूरी भीड़ न अहिंसा को मानती है और न ही न्याय की व्यवस्था को सम्मान देती है। ऐसा हिंसक व्यवहार मॉब-लिंचिंग तक ही सीमित नहीं रहता है बल्कि पग-पग पर देखने को मिलता है। जब किसी महिला के साथ दुष्कर्म होता है तो वहां भी अन्य जन घटना को रोकने का प्रयास करने के बजाय उस कुकृत्य में भागीदार बन जाते हैं। कुकृत्यों के उदाहरण आपको देखने-सुनने को मिल जायेंगे। लगता है करुणा भाव एवं उदात्त वृत्ति कहीं तिरोहित हो चुके हैं।

गांधी जयंती और स्वच्छता अभियान

पिछले तीनएक सालों से प्रधानमंत्री मोदी ने एक और आयाम गांधी जयंती से जोड़ा है, और वह है स्वच्छता संदेश। उनकी स्वच्छता की बातें लोगों को भा गई हैं। । “स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत” का नारा भी प्रचलन में आ चुका है। फिर भी देखने में आ रहा है कि अनेक लोगों का स्वच्छता के प्रति रवैया कमोबेश अपरिवर्तित है। यह मैं अपने शहर वाराणसी (मोदी का निर्वाचन क्षेत्र) में महसूस कर रहा हूं। सड़क के किनारे मूत्रत्याग की लोगों की आदत जा नहीं रही है। कूड़ादान पांच कदम की दूरी पर हो तो वहां तक जाकर कूड़ा-कचरा फैंकने की जहमत कई लोग उठाना नहीं चाहते। सड़कों पर छुट्टा जानवर जहां-तहां घूमते दिख जाएंगे और उनके गोबर से सड़कें गंदी हो रही हैं। ये जानवर सड़क के किनारे रखे कूड़े के डिब्बों से कचरा सड़क पर आज भी यथावत फैलाते मिल जाते हैं। इस तथ्य के प्रति प्रशासन बेखबर बना रहता है। दरअसल स्थानीय प्रशासन “काम चल जा रहा है” की उदासीन भावना से कार्य करता है। उसमें समस्याओं को हल करने का उत्साह एवं संकल्प ही नहीं दिखता है। सफाई का भाव नागरिकों में भी आधा-अधूरा ही है। अपने घर-आंगन को वे साफ भले ही रखते हों, लेकिन आम सड़क को साफ-सुथरा रखने में अपना योगदान देने में दिलचस्पी नहीं रखते हैं।  – योगेन्द्र जोशी

 

 

अगस्त 15, 72वां स्वतंत्रता दिवस – बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिए

बर्फ़ की तिरंगी सिल्ली

स्वाधीनता दिवस – एक पर्व

आज 15 अगस्त है देश की स्वातंत्र्य-प्राप्ति का दिन, जिसे पिछले एकहत्तर वर्षों से हम एक उत्सव के तौर पर मनाते आ रहे हैं। इस उपलक्ष्य पर मैं देशवासियों को बधाई देना चाहता हूं और कामना करता हूं कि हर व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने का संकल्प ले, उसे निभाने का प्रयास करे।

     ऊपरी तौर पर देखें तो हर भारतीय इस दिन स्वयं को एक स्वाधीन देश का नागरिक होने का गर्व अनुभव करेगा। किंतु हम स्वाधीन हैं इतना काफी है क्या? या इसके आगे भी कुछ और है? जिन लोगों ने इस स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए संघर्ष किया उन्होंने क्या स्वाधीनता की अर्थवत्ता के बारे में भी कुछ सोचा नहीं होगा? उन्होंने सोचा होगा न कि कैसे हम अपने देशवासियों को ऐसी शासकीय व्यवस्था दे पायेंगे जो उनके बहु-आयामी हितों को साधने का कार्य करेगा? क्या वह कर पाए हैं हम? या उस दिशा में ईमानदारी से बढ़ भी पाए हैं? या सही दिशा में बढ़ने का इरादा भी कर पाए हैं?

हम स्वाधीन हैं और उस स्वाधीनता का “उपभोक्ता” मैं भी हूं। मेरे लिए यह काफी महत्वपूर्ण है, किंतु पर्याप्त नहीं। इसके आगे भी मुझे बहुत कुछ और देखने की इच्छा है। मुझे खुद के लिए कुछ पाने की लालसा नहीं, क्योंकि मेरे पास अपने लिए पर्याप्त है। जितना एक आम आदमी के लिए वांछित हो उतना मुझे मिला ही है, उसके आगे बहुत और मैं पाना नहीं चाहूंगा। उसके विपरीत किसी को अपनी सामर्थ्य से कुछ दे सकूं तो वह अधिक संतोष देगा।

स्वाधीन भारत – उपलब्धियां

अब मैं असली मुद्दे पर आता हूं। मेरा जन्म देश की स्वातंत्र्य प्राप्ति के चंद महीनों पहले उत्तराखंड (तब उ.प्र.) के सुदूर गांव में हुआ था। अर्थात्‍ मैं परतंत्र देश में जन्मा, लेकिन उस काल का कोई अनुभव नहीं मिला। जब से होश संभाला स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस मनते हुए देखता आ रहा हूं। क्या अहमियत है इन दिवसों की? यह सवाल पिछले कुछ वर्षों से समझने की कोशिश कर रहा हूं।

इस में दो राय नहीं है कि एक स्वतंत्र और स्वशासित देश के रूप में हमने भौतिक स्तर पर काफी प्रगति की है। विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में से एक बनने की दिशा में देश अग्रसर है। लोगों की संपन्नता एवं आर्थिक समृद्धि में इजाफा हुआ है। देश अंकीय (डिजिटल) तकनीकी उपयोग करते हुए नई शासकीय व्यवस्था स्थापित कर रहा है। लोगों के हाथ में मोबाइल/ स्मार्टफोन पहुंच चुके हैं। जिन घरों में बिजली का पंखा मुश्किल से दिखता था उनमें “एसी” लग चुके हैं। सुख-सुविधा की तमाम युक्तियां लोगों की पहुंच में आ चुकी हैं। सड़कों पर मोटर बाइकें और कारें दौड़ रही हैं। साइकिल का प्रयोग जो करते थे वे उसे चलाना भी भूल चुके हैं। यह सच है कि इतना सब अभी भी समाज के एक बड़े तबके को मुहैया नही हो पाया है। फिर भी उस दिशा में देश बढ़ रहा है यह स्वीकारा ही जाएगा।

वैज्ञानिकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी काफी हद तक प्रगति हुई ही है। उपग्रह प्रक्षेपण में देश अग्रणी बन चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु देशज मिसाइलें बन चुकी हैं और नाभिकीय आयुधों का भी विकास हो चुका है। राकेट तकनीकी का भी उल्लेखनीय विकास हमारे वैज्ञानिक-अभियंता कर चुके हैं। चंद्रयान की बात पुरानी पड़ चुकी है; अब तो मंगल-यान की बात हो रही है।

यह सब उपलब्धियां कम हैं क्या एकहत्तर वर्ष पहले स्वतंत्र हुए देश के लिए? क्या इन सब पर गर्व नहीं होना चाहिए किसी भारतीय को? अवश्य गर्व होना चाहिए।

निजी अनुभव

इतना सब होते देखने के बाद भी मैं संतोष नहीं कर पाता। मुझे लगता है हमने जितना पाया है उससे अधिक खोया है। वैसे जो पाया और जो खोया उनके मूल्यों की तुलना करना आसान नहीं। हर व्यक्ति अपनी समझ और नजर से वस्तुस्थिति को देखेगा। क्या खोया इसका उल्लेख करने और अपनी निराशा व्यक्त करने से पहले मैं अपने दो-तीन अनुभवों की बात करता हूं:

(1) मैंने सन् 1962 में हाई-स्कूल परीक्षा पास की थी अपने गांव से 7-8 कि.मी. दूर के विद्यालय से। मुझे एक घटना की याद है जब जिले के किसी परीक्षा केन्द्र से खबर आई कि कोई छात्र वहां नकल करते पकड़ा गया। नकल का एक वाकया इलाके में खबर बन गई। नकल करने की कोई हिम्मत कर सकता है यह हम लोग तब सोचते भी नहीं थे। अब क्या है?

(2) अपने बचपन के दिनों में मैं मां-चाची आदि के वार्तालाप में इस प्रकार की बातें सुना करता था: “सुना है फलां आदमी घूस लेने लगा है।” कोई सरकारी कर्मी घूस भी लेता है यह तब खबर बन जाती थी। अब क्या है?

(3) 1972-73 की बात है जब रेल-यात्रा में मेरा बैग गुम हो गया था। उसमें हाई-स्कूल से एम.एससी. तक के प्रमाणपत्र थे। मैंने संबंधित संस्थाओं को प्रमाणपत्रों की द्वितीय प्रतियों हेतु निवेदन किया। मुझे बिना भाग-दौड़ और लेन-देन किए कुछ दिनों के अंतराल पर दस्तावेज मिल गए। मैं सोचता हूं आज वही कार्य इतना आसान न होता।

देश की वर्तमान दशा

मैं कल दोपहर एक टीवी समाचार सुन रहा था। उसमें इधर-उधर की आपराधिक घटनाओं का जिक्र था। दो-चार की बानगी पेश करता हूं:

(1) आगरा (उ.प्र.) में हिन्दू अतिवादियों ने किसी बात पर एक युवक की पिटाई कर दी थाने में ही पुलिस की मौजूदगी में।

(2) मेरठ (उ.प्र.) में किसी एसयूवी कार से आल्टो कार टकराई और एसयूवी के सशस्त्र सवारों ने दूसरी कार के दोनों सवारों की तबियत से पिटाई तो की ही, फिर अपनी कार में बिठाकर अज्ञात जगह ले भागे।

(3) मुरादाबाद (उ.प्र.) में उपद्रवी कांवड़ियों द्वारा सड़क पर किसी बात पर उत्पात मचाने की घटना का भी समाचार टीवी पर सुना।

(4) उन्नाव (उ.प्र.) में एक-तरफा प्यार में पागल शादीशुदा एक युवक ने युवती की मौजूदगी में ही उसके ब्यूटी पार्लर में तोड़फोड़ कर दी।

(5) ग्रेटर नॉयडा (उ.प्र.) में गुंडे-बदमाशों की गोली का शिकार हुआ एक व्यक्ति।

(6) नवी मुम्बई (महा.) में रंगदारी वसूलने के लिए दुकान में घुसे बदमाश दुकानदार पर ताबड़तोड गोली दागकर फरार हो गये।

(7) वैशाली (बिहार) से भी ऐसी ही एक घटना सुनने को मिली।

(यह विवरण याददास्त पर आधारित है; स्थान एवं घटना के स्वरूप बताने में उलटफेर हो गया होगा।)

ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की घटनाएं पहले नहीं होती थीं। तब कभी-कभार देखने-सुनने में आती थीं, लेकिन आजकल घटनाओं की बाढ़-सी आ चुकी है।

सरकारें अपराधियों को सजा देने का दावा करती हैं; कुछ मामलों में सजा भी हो जाती है। किंतु वे यह जानने के प्रयास नहीं करती हैं कि अपराध होते ही क्यों हैं? न सरकारें न ही देश के बुद्धिजीवी ऐसे किसी अध्ययन में रुचि ले रहे हैं। लोगों में आपराधिक प्रवृत्ति न पनपे इसके प्रयास होने चाहिए कि नहीं?

इन सब बातों को देखकर मुझे निराशा होती है। मेरा मत है कि देश विकट चारित्रिक पतन के दौर से गुजर रहा है। विकास एवं आर्थिक प्रगति इस पतन की भरपाई नहीं कर सकते है। एक सभ्य, सुसंस्कृत समाज की रचना महान्‍ देश की पहचान होनी चाहिए।

     मुझे यह देख हैरानी एवं क्षोभ होता है कि देश में अनेक लोग हैं जिनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ है, अनुशासनहीनता, स्वच्छंद आचरण, कायदे-कानूनों का उल्लंघन, इत्यादि। मैंने आरंभ में बताया कि 1962 में नकल को किस नजरिए से देखा जाता था। आज सरकारी स्कूल-कालेजों के छात्र नकल को अपना अधिकार समझते हैं। इतना ही नहीं उनका साथ शिक्षक, अभिभावक, और पुलिस भी दे रही है। सरकारी शिक्षा का स्तर गिर रहा है। यही आज के डाक्टरी पेशे का है जहां अनेक डाक्टर संपन्न होने के बावजूद मरीज के प्रति सहानुभूति नहीं रखते। पुलिस बल को देखकर कई जन घबराते हैं। कोई महिला शिकायत लेकर थाने जाने में डरती है कि वहां कहीं उसी का दुष्कर्म न हो जाए। दुष्कर्म की घटानाएं दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं। राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है ऐसा क्यों कहा जा रहा है? कुछ तो सच्चाई होगी। बिहार के मुजफ़्फ़रपुर और उ.प्र. के बालिका संरक्षण गृहों की घटनाएं आज के आपराधिक मानसिकता के लोगों की देन है जिन्हें राजनेताओं एवं प्रशासन से प्रशय मिल रहा होता है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। उ.प्र. के वाराणसी एवं बस्ती और पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी के निर्माणाधीन फ़्लाई-ओवरों का गिरना इसी भ्रष्टाचार के परिणाम हैं।

     यह विषय लंबी विवेचना चाहता है जिसे इस आलेख में शामिल करना कठिन है। कुल मिलाकर मैं यही मानता हूं कि देश चारित्रिक पतन की राह पर है। – योगेन्द्र जोशी

जाने कहां गये साइकिल के वो दिन … बनाम पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमत

जाने कहां गये वे दिन

सड़कों पर जब साइकिलें चलती थीं।

बच्चा हो या बूढ़ा या जवान

सबको साइकिलें प्यारी लगती थीं।

ठीक हाल में रहती थी हरदम

तभी स्कूल-कालेज पहुंचाती थीं।

अस्पताल जाना हो या ऑफिस

साइकिलें सबकी सवारी होती थीं।

पेट्रोल पंप पर लगे अब भीड़

तब हवा भराकर ही वो चलती थीं।

आयेंगे क्या लौट के वो दिन 

साइकिलें जब सड़क पर दिखती थीं।

पेट्रोल-डीज़ल – बढ़ती कीमतें

पिछले कुछ दिनों से पेट्रोल-डीज़ल के दाम प्रायः हर रोज बढ़ रहे हैं और देश की आम जनता बढ़ती कीमत से त्रस्त है। जिसको देखो वह इस मुद्दे पर मोदी सरकार की आलोचना कर रहा है। सरकार कहती कि अंताराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और देश की तेल कंपनियां उसी से मेल खाती कीमतें तय कर रही है। अब खबर यह है कि दाम कुछ घट रहे हैं  कहा यह भी जा रहा है कि यदि पेट्रोल-डीज़ल को भी जीएसटी (GST) के दायरे लाया जाए तो कीमत घट सकती हैं। किंतु इन पर जीएसटी लगाए जाने के पक्ष में कई राज्य नहीं, कारण कि वे इस पर लगे टैक्स से राज्य की कमाई करती हैं। कहा जाता है कि अपने देश में इन पर भांति-भांति के टैक्स भी बहुत हैं जिससे उनके दाम पहले से ही काफी रहे हैं।

जिस भी कारण से पेट्रोल-डीज़ल के मूल्य बढ़ रहे हों, उससे होनी वाली दिक्कत सभी महसूस कर रहे हैं। आज भौतिक प्रगति के उस मुक़ाम पर हम (मानव समाज) पहुंच चुके हैं जहां इन जीवास्म इंधनों के बिना जीवन सुचारु रूप से जीने की सोची नहीं जा सकती है। इन इंधनों पर हमारी निर्भरता समय के साथ कैसे बढ़ती गई है इस बात को समझने के लिए मैं पिछले करीब  46 वर्षों के  अपने निजी अनुभवों का जिक्र करता हूं।

निजी अनुभव

मैंने सन् 1972 में वाराणसी नगर के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) में बतौर एक शिक्षक के कार्य करना शुरू किया था। वे दिन थे जब इस नगर में पेट्रोल/डीज़ल-चालित वाहन आज की तुलना में नगण्य थे। जैसा मुझे अब याद है कि मेरे भौतिकी (फिज़िक्स) विभाग में कुल दो कारें (एक अंबेसेडर और दूसरी फ़िएट) करीब 40 शिक्षकों में से 2 के पास थीं। और शायद तीन या चार स्कूटर भी कुछ के पास थीं। विभाग में एक लेंब्रेटा, एक वेस्पा और एक फैंटाबुलस देखे की याद है मुझे। फैंटाबुलस स्कूटर का नाम कम ही लोगों ने सुना होगा और उसे कभी शायद देखा भी न हो। वह बाज़ार से बहुत पहले ही गायब हो गयी थी। अब तो स्कूटरों की जगह बाइकों ने ले ली है।

उस काल में स्कूटर खरीदना भी आसान नहीं था; कारण दो थे:

(1) पहला कारण यह कि उनकी कीमतें सामान्य संपन्नता वाले व्यक्ति के लिए भी हैसियत के बाहर होती थीं। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि तब मेरा मासिक वेतन लगभग 650 रुपये था जब कि स्कूटर की कीमत करीब 3000 रुपये होती थी। मतलब यह कि 5-6 महीने की कुल तनख्वाह बचाने पर ही मैं स्कूटर खरीद सकता था। आज विश्वविद्यालय का समकक्ष शिक्षक एक महीने के वेतन से ही बाइक/स्कूटी खरीद सकता है।

(2) दूसरा कारण वास्तव में अधिक गंभीर था। कारण यह था कि स्कूटरों-बाइकों-कारों का उत्पादन देश में बहुत कम था, शायद डेड़-दो लाख से अधिक नहीं। पैसा पास होने और शौक होने के वाबजूद लोगों को स्कूटर की उपलब्धता नहीं थी, कारों की तो बात ही छोड़िए।

वह काल था जब मेरे शहर वाराणसी में साइकिल अथवा रिक्शा से आवागमन होता था। शहर में सरकारी बस-सेवा भी उपलब्ध थी लेकिन ऑटोरिक्शा नहीं थे। जनसंख्या भी तब आज की तुलना में एक-तिहाई/एक-चौथाई रही होगी। वह समय था जब वाहनों द्वारा पैदा धूल-धुएं का प्रदूषण खास न था, न उनका शोर-शराबा था, और सड़कों पर न ही आज के जैसा जाम।

1970 के बाद माहौल बदला जिसके तहत कई प्रांतों में स्कूटरों का उत्पादन आरंभ हुआ, नीजी कंपनियों या सरकारी उद्यमों के द्वारा, जैसे उत्तर प्रदेश में तब ‘स्कूटर्ज़ इंडिया’ स्थापना हुई थी जो अब थ्री-व्हीलर वाहन बनाती है। मुझे याद आता है कि उसी दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी ने ‘मारुति’ कार का उद्योग स्थापित किया जो उनकी असामयिक मृत्यु के बाद ‘मारुति-सुजुकी’ उद्योग बना। सीमित संख्या में कारें, जैसे ‘अंबेसडर’, ‘फ़िएट, एवं शायद ‘स्टैंडर्ड’ देश में बन रही थीं, लेकिन उनकी संख्या इस विशाल देश के लिए ’अपर्याप्त’ थीं।

मेरा ख्याल है कि 1990 का दशक आते-आते देश में कार-निर्माण एवं बाइक-निर्माण उद्योग को बढ़ावा मिला। और सड़कों पर कारों-बाइकों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी।

सड़कों पर वाहनों की बढ़ती भीड़

आज स्थिति यह है कि मध्यम वर्ग के अधिकांश लोगों की आमदनी इतनी है कि वे कारें खरीद सकते हैं। इस हेतु बैंकों से भी आमदनी के अनुरूप आसान किस्तों में ऋण या कर्ज मिल जाता है। आज से 45-50 साल पहले तक कर्ज का जुगाड़ करना आसान नहीं था। लोगों की प्राथमिकताएं भी भिन्न थीं। लोग निजी मकान, बाल-बच्चों की पढ़ाई, उनकी शादी-ब्याह के लिए पैसे की बचत की अधिक सोचते थे। आजकल मध्यम वर्ग में परिवार छोटे हो गये हैं और शादी-ब्याह भी विलंब से होते हैं। प्राथमिकताएं भी बदल चुकी हैं। परिणाम यह है कि नयी पीढ़ी के युवा कार-बाइक की व्यवस्था की पहले सोचने लगे हैं और अन्य बातों की चिंता बाद करते हैं।

जहां तक बाइकों का सवाल है इसने साइकिलों की जगह ले ली है। अब समाज के अपेक्षया कमजोर तबके के लोगों के पास भी बाइक दिखने लगी है।

अमेरिका जैसे विकसित देशों में निजी वाहन एक आवश्यकता बन चुकी है। और हमारा देश भी उसी संस्कृति की ओर बढ़ रहा है। गौर करें कि अपने यहां प्रति व्यक्ति औसत आय अमेरिका की तुलना में 4-6 गुना कम है और पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें वहां से अधिक। फिर भी निजी वाहनों पर जोर अधिक है और सरकारें आर्थिक विकास पाने के चक्कर में लोगों को इस दिशा में ही प्रेरित कर रही हैं। वे साइकिलों के प्रयोग को बढ़ावा देने के बजाय बाइकों-कारों को प्रोत्साहित कर रही हैं। निजी वाहन यहां ‘झूठी’ सामाजिक प्रतिष्ठा के द्योतक बन चुके हैं।

आरंभ में मैंने अपने विश्वविद्यालयीय विभाग में कारों/स्कूटरों की नगण्य संख्या की बात कही थी। आज उस विभाग में प्रायः हर शिक्षक के पास कार है। शहर में भी धनाड्यों/नवधनाड्यों की संख्या बहुत बढ़ गई है। अतः सर्वत्र कारों की भीड़ नजर आती है। साइकिलों की जगह बाइकों ने ले ली है। जो लोग पहले साइकिलों से चलते थे वे अब साइकिल चलाना भी भूल चुके हैं और उनके घरों से साइकिलें ग़ायब हो चुकी हैं। पहले 10-15 किमी की दूरी साइकिल से तय करना आम बात थी। लेकिन अब स्कूली बच्चे साइकिल से कम ही जाते हैं और स्कूटर-बाइक-कारों से अधिक!

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि आज के लोग सुविधाभोगी तथा आरामतलब हो चुके हैं। साइकिल एवं रिक्शा आर्थिक रूप से अपेक्षया कमजोर लोगों की चीजें रह गई हैं। अपेक्षया संपन्न वर्ग के लिए आवागमन हेतु पेट्रोल-डीज़ल निहायत जरूरी उपभोक्ता वस्तुएं बन चुके हैं। इनकी कीमतों में तनिक भी उछाल आने पर या इनकी उपलब्धता कम हो जाने पर हाहाकार मच जाता है।

कोई विकल्प नहीं क्या?

हाल के दिनों में जो मूल्यवृद्धि हुई वह परोक्ष रूप से सभी को प्रभावित करती है इसे औरों की तरह मैं भी स्वीकार करता हूं। यातायात, मालढुलाई, कृषिकार्य आदि जैसे सामुदायिक महत्व के कामों की पेट्रोल-डीज़ल पर निर्भरता को नकारा नहीं जा सकता। व्यक्तिगत तौर पर शायद ही कुछ किया जा सकता है। किंतु यह सवाल तो पूछा ही जा सकता है कि हम न्यूनाधिक शारीरिक श्रम करके अपने बजट को नियंत्रित नहीं कर सकते क्या? एक-डेड़ किलोमीटर दूर जाना हो तो कार-बाइकों का सहारा न लेकर पैदल नहीं जा सकते? साइकिल का यथासंभव उपयोग क्या नहीं किया जा सकता? बच्चों को पैदल या साइकिल से स्कूल-कालेज जाने को प्रेरित नहीं कर सकते?

साइकिल चलाने के अपने लाभ हैं: (1) साइकिल खुद में सस्ता वाहन है; (2) शारीरिक श्रम का अवसर प्रदान कर स्वास्थ्य-लाभ देती है; (3) न पेट्रोल का  खर्चा और न ही रखरखाव में कठिनाई; (4) पार्किंग में कम जगह घेरती है; और (4) प्रदूषक न होने के कारण पर्यावरण के लिए हितकर।

निजी वाहनों का एक विकल्प भी है। सरकारें सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था करके भी लोगों के पेट्रोल खर्च को घटा सकती हैं। इस संदर्भ में सिंगापुर का उदाहरण दिया जा सकता है। वहां सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था उत्कृष्ट श्रेणी की बताई जाती है और खर्चीले निजी वाहन रखने की तुलना में सुविधाजनक भी है। दुर्भाग्य से हमारे यहां की व्यवस्था घटिया दर्जे की और अपर्याप्त है। यह व्यवस्था अपेक्षया कम संपन्न लोगों तक सीमित देखी गयी है। इसके प्रयोग में मिथ्या प्रतिष्ठा भी आड़े आती है।

कुल मिलाकर यह कहना चाहूंगा कि हमें सुविधाभोगी न बनकर शारीरिक श्रम की आदत डालनी चाहिए। – योगेन्द्र जोशी

 

कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी की ताजपोशी

 

चुनाव कांग्रेस के पार्टी अध्यक्ष का

समाचार माध्यमों के अनुसार श्री राहुल गांधी ने बीते 16 तारीख (दिसंबर) कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद संभाल लिया है। मेरी समझ से यह औपचारिकता 19 तारीख होनी चाहिए थी।

अध्यक्ष पद के चुनाव की पूरी प्रक्रिया इस बार जोर-शोर से प्रकाशित हुई और समाचार माध्यमों पर चर्चा का विषय बनी। कार्यक्रम के अनुसार इस माह (दिसंबर) की 1ली तारीख चुनाव की विज्ञप्ति जारी की गई;  नामांकन एवं उनकी जांच 5 तारीख और नाम-वापसी की तारीख 11 रखी गई। मतदान 16 को होना था जिसकी आश्यकता नहीं रह गई। चुनाव परिणाम 19 दिसंबर घोषित होने हैं जिस दिन राहुल गांधी को औपचारिक तौर पर पार्टी का नवनिर्वाचित अध्यक्ष घोषित कर दिया जाना था। (देखें इंडियन एक्सप्रैस समाचार)

ध्यान दें कि इस बार नेहरू-गांधी परिवार के इस वारिस की ताजपोशी के लिए अध्यक्ष पद का चुनाव निर्धारित प्रक्रियानुसार किया गया है। मेरी जानकारी में लंबे अरसे से पार्टी-अध्यक्ष चुने जाने की प्रक्रिया नहीं अपनाई जा रही थी। राहुल के चुनाव की पूरी प्रक्रिया की बात मीडिया में इतनी क्यों छाई रही यह मेरी समझ से बाहर है। क्या कांग्रेस यह दिखाना चाहती है कि वह पूरी लोकतांत्रिक पद्धति से अध्यक्ष का चुनाव करती है? पहले भी यही गंभीरता दिखाई गई है क्या?

इस विषय पर आगे कुछ कहने से पहले पार्टी-संविधान के अनुसार क्या होना चाहिए इसकी चर्चा कर लूं। मेरी जानकारी हिन्दुस्तान अखबार

में छपी खबर पर आधारित है। पार्टी की शीर्ष समिति, कांग्रेस वर्किंग कमिटी, चुनाव का कार्यक्रम निर्धारित करती है। 10 या अधिक पार्टी-प्रतिनिधि इच्छुक प्रत्याशी का नामांकन करते हैं। राज्यों की वर्किंग कमिटियों के सदस्य प्रतिनिधि होते हैं। नामांकन की अंतिम तारीख के बाद कोई भी प्रत्याशी 7 दिनों के भीतर  नाम वापस ले सकता है। उसके बाद नियत तारीख पर आवश्यक होने पर मतदान होता है। 50% से अधिक मत पाने वाला निर्वाचित अध्यक्ष कहलाता है जो अगले अधिवेशन (जब भी हो) की अध्यक्षता करता है जिसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। आवश्यक होने पर मतों में व्यक्त दूसरी वरीयता को भी शामिल किया जाता है। 4 दशक पूर्व तक यह  मात्र 1 वर्ष का होता था।

कांग्रेस संविधान की एक बात महत्वपूर्ण है: कांग्रेस वर्किंग कमिटी को यह अधिकार है कि समय पर चुनाव न करवा पाने पर वह अनंतिम (provisional) या अस्थाई तौर पर किसी को भी अध्यक्ष पद पर नियुक्त कर सकती है। मैं समझता हूं कि यह प्राविधान कुछ विशेष परिस्थितियों के लिए स्वीकारा गया होगा। लेकिन इसका भरपूर – और मेरी दृष्टि में बेजा – इस्तेमाल नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के लिए किया गया है। इसी प्राविधान के तहत ही इंदिरा, राजीव (जब तक ये दो जीवित रहे), और सोनिया गांधी लंबे अरसे तक पार्टी अध्यक्ष बने रहे। सोनिया गांधी तो लगातार 19 वर्षों तक शीर्ष पद पर बनी रहीं। अवश्य ही सन् 2000 में कांग्रेस नेता जितेन्द्र प्रसाद उनके विरुद्ध चुनाव लड़े परंतु उन्हें  बहुत बुरी हार मिली।

विगत काल के कांग्रेस अध्य्क्ष

इस आलेख के अंत में सन् 1885 से अब तक के कांग्रेस अध्यक्षों की सूची शामिल की गई है। इस विषय की जानकारी ऑल इंडिया कांग्रेसआईएनसी (इंडियन नैशनल कांग्रेस), एवं विकीपीडिया आदि की वेबसाइटों पर मिल सकती है।

सूची में लाल रंग एवं कोष्टक में अंकित संख्या कोई व्यक्ति कितनी बार अध्यक्ष चुना गया इसकी जानकारी देता है। गौर से देखने पर कुछ बातें साफ नजर आएंगी। स्वातंत्र्य पूर्व अध्यक्षों का कार्यकाल एक वर्ष का होता था। विशेष परिस्थितियों में कार्यकाल कुछ माह का या साल भर से भी अधिक का होता होगा ऐसा मेरा सोचना है। उदाहरण के तौर पर 1918 में आयोजित विशेष अधिवेशन (बम्बई) की अध्यक्षता सैयद हसन इमाम (Syed Hasan Imam) ने की थी और उसी वर्ष के दूसरे अधिवेशन में मदन मोहन मालवीय (Madan Mohan Malaviyav) ने अध्यक्षता की।

दी गई सूची में उन कांग्रेस नेताओं के नाम लाल रंग से इंगित हैं जो एक से अधिक बार अध्यक्ष बने। स्वतंत्रता पूर्व भारत में दादाभाई नरौजी,  मदन मोहन मालवीय, जवाहर लाल नेहरू अधिकतम 3 बार अध्यक्ष बने। स्वतंत्रता के बाद भी नेहरूजी 3 बार (लगातार) अध्यक्ष बने थे। इस प्रकार नेहरूजी कुल 6 बार अध्यक्ष बने। अन्यथा सूची से यह ज्ञात होता है कि धेबर महोदय 5 बार अध्यक्ष चुने गए। धेबर को छोड़ कोई भी इस पद पर लगातार 5 साल से अधिक नहीं रहा।

कांग्रेस के अध्यक्षों की एक वर्ष के कार्यकाल की परंपरा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी कुछ समय तक चलती रही। लेकिन जब इंदिरा गांधी कांग्रेस राजनीति में ताकतबर नेता के तौर पर उभरीं और 1966 में देश की प्रधानमंत्री बनी तो यह सिलसिला गड़बड़ाने लगा। सन्‍ 1969 से अध्यक्ष का कार्यकाल 3-3 वर्ष का देखने को मिलता है।

पंचवर्षीय कार्यकाल

कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष का कार्यकाल आजकल 5 वर्ष का है। मेरा ख्याल है कि यह तबदीली इंदिरा गांधी के समय (1978) से हो गया था। वे 1978 में और फिर 1983 में अध्यक्ष बनी। लेकिन 1984  में उनकी हत्या हो गई। तत्पश्चात्‍ कुछ माह के लिए अनंतिम तौर पर कोई अध्यक्ष रहा या नहीं मुझे पता नहीं। अवश्य ही वरिष्ठतम उपाध्यक्ष ने पद संभाला होगा। बाद में 1985 के बंबई अधिवेशन में राजीव गांधी अध्यक्ष चुने गए, लेकिन उनकी हत्या (मई 21, 1991) के बाद यह पद कुछ समय खाली रहा।

इंदिरा गांधी के काल में ही यह सुनिश्चित हो गया था कि अध्यक्ष पद नेहरू-गांधी परिवार में ही रहना है। कमोबेश सभी कांग्रेस-जनों को यह स्वीकार्य था। यदि राजीव गांधी जीवित होते तो शायद आज भी वही पार्टी अध्यक्ष होते, या अपने जीवन काल ही में वे राहुल को गद्दी सोंप दिए होते।

राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस में उक्त परिवार का कोई भी सदस्य नहीं रह गया था। कांग्रेस दल में एक प्रकार की रिक्तता छा गई। यह मौका था जब कांग्रेसी नेहरू-गांधी परिवार के आभामंडल से बाहर निकल सकते थे। ऐसा हुआ भी लेकिन प्रयोग सफल नहीं हुआ। 1992 में पी.वी. नरसिम्हाराव अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने सत्ता भी संभाली। 5 वर्ष के कार्यकाल के दौरान तमाम आरोप लगे। विपक्षियों का विरोध तो उन्हें झेलना पड़ा, उसके अलावा कांग्रेस पार्टी के भीतर असंतोष भी पनपने लगा।

सन्‍ 1996 के आम चुनाव में कांग्रेस को हार का मुख देखना पड़ा। विपक्षी दलों (भाजपा को छोड़कर) के गठबंधन ने सरकार बनाई जो लगभग दो वर्षों के भीतर ही अपने अंतर्विरोधों के चलते बिखर गई। 1997 में वरिष्ठ नेता सीताराम केसरी ने अध्यक्ष पद संभाला किंतु उसके पहले के 5-6 सालों के अंतराल में कांग्रेस के भीतर यह विचार जड़ें जमा चुका था कि नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य के बिना पार्टी का उद्धार कोई नहीं कर सकता। अतः सोनिया गांधी को मनाया जाने लगा। कांग्रेस जनों के दबाव या प्रार्थना के बावजूद वह लंबे समय तक राजनीति से दूर रह रही थीं, किंतु अंततः 1997 के अंत आते-आते उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार कर ली और लगभग दो माह बाद केसरी को पद से हटाकर 1998 के आरंभ में उन्हें अध्यक्ष की गद्दी सोंप दी गई। तब से वह अभी तक (19 वर्ष) इस पर काबिज हैं, हालांकि 2000 में जितेन्द्र प्रसाद ने उन्हें चुनौती दी थी।

वर्तमान कांग्रेस की राजनैतिक संस्कृति

विगत कुछ दशकों में स्पष्टतः परिभाषित एवं मीडिया में प्रकाशित चुनाव-प्रक्रिया कितनी बार अपनाई गई यह मैं नहीं जानता। अगर अपनाई भी गई हो तो वह खानापूर्ति से अधिक कुछ भी नहीं रही होगी। हर बार मीडिया में खबर छप जाती थी कि अमुक व्यक्ति (आवश्यक रूप से नेहरू परिवार का सदस्य) पार्टी-अध्यक्ष चुन लिया गया है।

लेकिन इस बार इतना ढिंढोरा क्यों पीटा गया? इसका कारण है।

पिछले कुछ वर्षों से सोनिया गांधी अस्वस्थ चल रही हैं। वे अध्यक्ष के कार्यभार से मुक्त होना चाहती थीं। अपनी विरासत किसे सोंपें? राहुल गांधी से बेहतर (उनके लिए) कौन वारिस हो सकता हैं? यों पुत्री प्रियंका (वाड्रा) को अधिक कांग्रेसी चाहते हैं ऐसा मालूम पड़ता है। कदाचित् पुत्रमोह उन्हें राहुल को पार्टी के शीर्ष पद पर स्थापित करने को प्रेरित करता है। यों भी गांधी के नाम से प्रियंका नहीं जानी जाएंगी जो एक प्रकार से दिक्कत की बात हो सकती है। राहुल को तैयार करने के लिए सोनिया गांधी ने उन्हें अपने अधिकार कुछ हद तक सोंप दिए थे। राहुल कहने को उपाध्यक्ष थे लेकिन अघोषित तौर पर कार्यकारी अध्यक्ष बने हुए थे।

कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी से कहीं अधिक वरिष्ठ एवं अनुभवी नेता रहे हैं लेकिन उनमें से किसी को भी वे विशेषाधिकार प्राप्त नहीं हो सके जो राहुल गांधी को प्राप्त रहे हैं। दरअसल इंदिरा गांधी के समय ही यह परंपरा स्थापित हो गई थी कि अध्यक्ष का पद नेहरू-गांधी परिवार के लिए आरक्षित रहेगा। राहुल गांधी को एक कार्यकर्ता की हैसियत से कोई अनुभव एवं योग्यता प्राप्त न होने बावजूद उन्हें 2004 में सीधे महासचिव और तत्पश्चात् 2013 में (वरिष्ठ्तम?) उपाध्यक्ष बना दिया गया। कांग्रेसजन बंधुआ नेताओं की तरह सब हंसते हुए, खुशी मनाते हुए, स्वीकार करते आ रहे हैं (बंधुआ नेता – बंधुआ मजदूरों के माफिक)।

कांग्रसजनों का तर्क सदैव यह रहा है: “नेहरू-गांधी परिवार ने इस देश के लिए जो त्याग किया है, बलिदान दिया है, उससे किसी और की तुलना नहीं की जा सकती। इसलिए कांग्रेस की हो बागडोर या देश की वह तो नेहरू-गांधी परिवार के हाथों में ही होनी चाहिए।”

यह तर्क (या कुतर्क?) यह मान के चलता है कि पुरखों के योगदानों का फल उनकी आने वाली पीढ़ियों को मिलते रहना चाहिए। यह मान भी लें कि उक्त परिवार के सदस्यों का योगदान अविस्मरणीय रहा है, लेकिन क्या अन्य परिवारों ने देश के लिए बलिदान नहीं दिए? उनमें से कितनों को कांग्रेसियों ने महत्व दिया है? कहां हैं वे और क्या हैसियत है उनकी आज के कांग्रेस दल में? उसी नेहरू-गांधी परिवार के तो मेनका गांधी और वरुण गांधी भी हैं। उनको उस परिवार के योगदानों का श्रेय और लाभ क्यों नहीं दिया जा रहा है?

राहुल की ताजपोशी : चुनाव का दिखावा?

राहुल की ताजपोशी की बात लंबे अरसे से चल रही थी। विगत कुछ समय से यह सुनने में आता रहा है कि राहुल अमुक तारीख तक अध्यक्ष पद ग्रहण कर लेंगे; और वह तारीख टलती जा रही थी। राहुल का कहना था, “अभी मुझे पार्टी के बारे में बहुत कुछ समझना है, बहुत कुछ सीखना है।” कांग्रेसजनों ने तो मन बना ही रखा था कि जब राहुल तैयार हो जाएंगे और चाहेंगे उनको अध्यक्ष पद सोंप दिया जाएगा। वह घड़ी आ गई, राहुल ने हांमी भर दी, और कांग्रेसियों की ख्वाहिश पूरी हो गई।

पूरा देश जानता था जब भी होगा राहुल को ही अध्यक्ष बनना हैं। तब निर्वाचन की प्रक्रिया का दिखावा क्यों? उसका भी कारण है। राहुल कहते आ रहे थे कि वह पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र स्थापित करेंगे और पार्टी के संविधान के अनुसार कार्य निबटाएंगे। क्या अभी तक आंतरिक लोकतंत्र नहीं था?

अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया दिखावा भर है यह बात शहज़ाद पूनावाला की बातों से स्पष्ट है। शहज़ाद कांग्रेस का सदस्य और महाराष्ट्र राज्य में पार्टी-सचिव हैं। अभी तक उन्होंने राहुल के लिए ही कार्य किया है। लेकिन इस बार उन्हें लगा कि कांग्रेस की संस्कृति के अनुसार कोई भी अन्य कांग्रेसी अध्यक्ष पद के लिए नामांकन कर ही नहीं सकता। हर कोई यह मान के चलता है कि जब तक नेहरू-गांधी परिवार का सदस्य उपलब्ध हो किसी और को चुनाव लड़ने की सोचनी ही नहीं चाहिए। जब स्थिति इतनी स्पष्ट थी तो चुनाव का ढोंग रचने की आवश्यकता ही क्या थी? और यदि लोकतांत्रिकता का प्रदर्शन करना ही था तो किसी और को भी नामांकन के लिए प्रेरित करना चहिए था – दिखावे के लिए ही सही।

कांग्रेसजनों का नेहरू-गांधी परिवार के प्रति कितनी अंधभक्ति है इसका ज्वलंत उदाहरण शहज़ाद के बड़े भाई तहसीन पूनावाला (वे भी कांग्रेस सदस्य) ने पेश किया है। उन्होंने और उनके परिवार ने शहजाद से परिवारिक नाते ही तोड़ दिए। “तुम्हारी ये हिम्मत कैसे हो गई?”

खैर, “कोई अध्यक्ष होय हमें का हानि!”

भारतीय यानी इंडियन लोकतंत्र

भारत यानी इंडिया विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लेकिन यह महान् लोकतंत्र नहीं है। बड़ा होना इसकी उपलब्धि नहीं बल्कि विवशता है। जब आबादी अमेरिका से करीब 4 गुना हो तब बड़ा तो होना ही है। किंतु महान् बनने के लिए आबादी नहीं लोकतंत्र की गुणवत्ता माने रखती है। अपनी उम्र के 70 वर्ष के पड़ाव पर यही कह सकता हूं कि समय के साथ लोकतंत्र में गिरावट ही आई है। तब महानता के लक्षण कहां?  देश में अनेक राजनैतिक दल चुनाव लड़ते हैं। उनमें से कितनों में आंतरिक लोकतंत्र है? कदाचित् 10% में भी नहीं। सभी में सामन्ती व्यवस्था है। कांग्रेस ने भी उसी व्यवस्था को अपना लिया है।

असल में कांग्रेस पार्टी में यह धारणा घर गई है कि इसके बिखराव को केवल नेहरू-गांधी परिवार ही रोक सकता है। – योगेन्द्र जोशी

List of Past Presidents of Indian National Congress (INC, Congress in short)

 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (संक्षेप में कांग्रेस) के विगत-काल के अध्यक्षों की सूची

 

स्वातंत्र्यपूर्व भारत Pre-Independence India
1885 (Bombay बम्बई) Womesh Chandra Bonnerjee वोमेश चन्द्र बनर्जी (1)
1886 (Calcutta कलकत्ता) Dadabhai Naoroji दादाभाई नरौजी (1)
1887(Madras मद्रास) Badruddin Tyabji बदरुद्दीन तैयबजी
1888 (Allahabad इलाहाबाद) George Yule ज्यॉर्ज यूल
1889 (Bombay बम्बई) William Wedderburn विलिअम वेडरबर्न
1890 (Calcutta कलकत्ता) Pherozeshah Mehta फ़िरोज़शाह मेहता
1891 (Nagpur नागपुर) P. Ananda Charlu पी. आनन्द चार्लू
1892 (Allahabad इलाहाबाद) Womesh Chandra Bonnerjee वोमेश चन्द्र बनर्जी (2)
1893 (Lahore लाहौर) Dadabhai Naoroji दादाभाई नरौजी (2)
1894 (Madras मद्रास) Alfred Webb आलफ़्रेड वेब
1895 (Poona पूना ) Surendranath Banerjea  सुरेन्द्र नाथ बनर्जी
1896 (Calcutta कलकत्ता) Rahimtulla M. Sayani   रहीमतुल्ला एम. सयानी
1897 (Amraoti अमरावती) C. Sankaran Nair सी. शंकरन नायर
1898 (Madras, मद्रास) Ananda Mohan Bose आनंद मोहन बोस
1899 (Lucknow, लखनऊ) Romesh Chunder Dutt रमेश चंद्र दत्त
1900 (Lahore लाहौर) Narayan Ganesh Chandavarkar नारायण गणेश चंदावरकर
1901 (Calcutta, कलकत्ता) Dinshaw Edulji Wacha  दिनशॉ एदुलजी वाचा
1902 (Ahmedabad अहमदाबाद) Surendranath Banerjea सुरेन्द्र नाथ बनर्जी
1903 (Madras, मद्रास) Lalmohan Ghosh  लालमोहन घोष
1904 (Bombay, बम्बई) Henry Cotton हेनरी कॉटन
1905 (Benares बनारस) Gopal Krishna Gokhale गोपाल कृष्ण गोखले
1906 (Calcutta कलकत्ता) Dadabhai Naoroji दादाभाई नरौजी (3)
1907 (Surat सूरत) Rashbihari Ghosh  राशबिहारी घोष (1)
1908 (Madras मद्रास) Rashbihari Ghosh  राशबिहारी घोष (2)
1909 (Lahore लाहौर) Madan Mohan Malaviya मदन मोहन मालवीय (1)
1910 (Allahabad इलाहाबाद) William Wedderburn  विलिअम वेडरबर्न
1911 (Calcutta कलकत्ता) Bishan Narayan Dar  बिशन नारायन डार
1912 (Bankipur बांकीपुर) Rao Bahadur Raghunath Narasinha Mudholkar

राव बहादुर रघुनाथ नरसिंह मुधोलकर

1913 (Karachi करांची) Nawab Syed Mohammad Bahadur

नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर

1914 (Madras मद्रास) Bhupendra Nath Bose  भूपेन्द्र नाथ बोस
1915 (Bombay, बम्बई) Satyendra Prasanna Sinha सत्येन्द्र प्रसन्ना सिंहा
1916 (Lucknow लखनऊ) Ambica Charan Mazumdar अंबिका चरन मजुमदार
1917 (Calcutta, कलकत्ता) Annie Besant  एनी बेसंट
1918 (Bombay, बम्बई) Syed Hasan Imam सैयद हसन इमाम
1918 (Delhi दिल्ली) Madan Mohan Malaviyav मदन मोहन मालवीय (2)
1919 (Amritsar अमृतसर) Motilal Nehru  मोतीलाल नेहरू (1)
1920 (Calcutta, कलकत्ता) Lala Lajpat Rai  लाला लाजपत राय
1920 (Nagpur नागपुर ) C. Vijayaraghavachariar  सी. विजय राघवाचारियार
1921 (Ahmedabad अहमदाबाद) Hakim Ajmal Khan  हकीम अजमल ख़ान
1922 (Gaya गया) Chittaranjan Das  चित्तरंजन दास
1923 (Cocanada काकीनाड) Maulana Mohammad Ali  मौलाना मुहम्मद अली
1923 (Delhi दिल्ली) Maulana Abul Kalam Azad  मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (1)
1924 (Belgaum बेलगाम) Mohandas Karamchand Gandhi  मोहनदास करमचंद गांधी
1925 (Kanpur कानपुर) Sarojini Naidu  सरोजिनी नायडू
1926 (Gauhati गुवाहाटी S. Srinivasa Iyengar एस. श्रीनिवास आयंगर
1927 (Madras मद्रास) Mukhtar Ahmad Ansari  मुख़्तार अहमद अंसारी
1928 (Calcutta, कलकत्ता) Motilal Nehru  मोतीलाल नेहरू (2)
1929 (Lahore लाहौर) Jawaharlal Nehru  जवाहर लाल नेहरू (1)
1931 (Karachi करांची) Vallabhbhai Patel  बल्लभभाई पटेल
1932 (Delhi दिल्ली) Madan Mohan Malaviya मदन मोहन मालवीय (3)
1933 (Calcutta, कलकत्ता) Nellie Sen Gupta नेली सेन गुप्ता
1934 (Bombay, बम्बई) Rajendra Prasad राजेन्द्र प्रसाद
1935 (Lucknow लखनऊ) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (2)
1936 (Faizpur फ़ैज़पुर) Jawaharlal Nehru  जवाहर लाल नेहरू (3)
1938 (Haripura हरीपुरा) Subhas Chandra Bose सुभाष चंद्र बोस (1)
1939 (Tripuri त्रिपुरी) Subhas Chandra Bose सुभाष चंद्र बोस (2)
1940 (Ramgarh रामगढ़) Maulana Abul Kalam Azad मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (2)
1946 (Meerut मेरठ) J. B. Kripalani  जे. बी. कृपलानी
स्वातंत्र्योत्तर भारत Post-Independence India
1948 (Jaipur जयपुर) Pattabhi Sitaramayya  पट्टाभि सीतारमैय्या
1950 (Nasik नासिक) Purshottam Das Tandon  पुरुषोत्तम दास टंडन
1951 (New Delhi नई दिल्ली) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (4)
1953 (Hyderabad हैदराबाद) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (5)
1954 (Kalyani कल्याणी) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (6)
1955 (Avadi अवादी) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (1)
1956 (Amritsar अमृतसर) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (2)
1957 (Indore इंदौर) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (3)
1958 (Gauhati गुवाहाटी) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (4)
1959 (Nagpur नागपुर) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (5)
1960 (Bangalore बंगलौर) Neelam Sanjeeva Reddy  नीलम संजीव रेड्डी (1)
1961 (Bhavnagar भावनगर) Neelam Sanjeeva Reddy  नीलम संजीव रेड्डी (2)
1962 (Patna पटना) Neelam Sanjeeva Reddy नीलम संजीव रेड्डी (3)
1964 (Bhubaneswar भुवनेश्वर) K. Kamaraj के. कामराज (1)
1965 (Durgapur दुर्गापुर) K. Kamaraj के. कामराज (2)
1966 (Jaipur जयपुर) K. Kamaraj के. कामराज (3)
1968 (Hyderabad हैदराबाद) S. Nijalingappa एस. निजलिंगप्पा (1)
1969 (Faridabad फ़रीदाबाद) S. Nijalingappa एस. निजलिंगप्पा (2)
1969 (Bombay बम्बई) Jagjivan Ram  जगजीवन राम
1972 (Calcutta कलकत्ता) Shankar Dayal Sharma  शंकर दयाल शर्मा
1975 (Chandigarh चंडीगढ़) Dev Kanta Borooah देवकांत बरुआ
1978 (New Delhi नई दिल्ली) Indira Gandhi इंदिरा गांधी (1)
1983 (Calcutta, कलकत्ता) Indira Gandhi इंदिरा गांधी (2)
1985 (Bombay बम्बई) Rajiv Gandhi राजीव गांधी
1992 (Tirupati तिरुपति) P. V. Narasimha  Rao पी.वी. नरसिम्हाराव
1997 (Calcutta कलकत्ता) Sitaram Kesri सीताराम केसरी
1998 (New Delhi नई दिल्ली) Sonia Gandhi सोनिया गांधी

 

11 जुलाई, विश्व जनसंख्या दिवस – भारत की विकट समस्या, जनसंख्या

विश्व जनसंख्या दिवस – उद्देश्य

आज, जुलाई 11, विश्व जनसंख्या दिवस है। क्या भारत के संदर्भ में इसकी कोई अहमियत है? मेरी नजर में नही!

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1989 में 11 जुलाई का दिन “विश्व जनसंख्या दिवस” के तौर पर घोषित किया था। असल में 1987 की इसी तारीख पर विश्व जनसंख्या उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित अनुमान के अनुसार 5 अरब को पार कर गई थी। संयुक्त राष्ट्र को तब लगा कि दुनिया की आबादी को नियंत्रित किया जाना चाहिए, और  इसके लिए सभी को जागरूक किया जाना चाहिए। उस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए दो वर्ष बाद इस दिन को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

उक्त जनसंख्या दिवस का उद्देश्य है सभी देशों के नागरिकों को बढ़ती आबादी से उत्पन्न खतरों के प्रति जागरूक करना और उन्हें आबादी नियंत्रण के प्रति प्रेरित करना। क्या भारत की सरकारें, यहां की संस्थाएं और सामान्य जन इस समस्या को कोई अहमियत दे पाए हैं? उत्तर नहीं में ही मिलता है।

भारत – अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि

ध्यान दें इस दिवस को अब 28 वर्ष हो रहे हैं। यह अंतराल छोटा नहीं; इस बीच पूरी एक नयी पीढ़ी पैदा हो चुकी है और उसके बाद की पीढ़ी पैदा होकर शैशवावस्था में आ चुकी है। यदि देश में जनसंख्या को लेकर कुछ भी सार्थक एवं कारगर किया जा रहा होता तो इन लगभग 3 दशकों में उल्लेखनीय परिणाम देखने को मिल चुके होते। जनसंख्या उसी रफ्तार से या थोड़ा-सा कम रफ्तार से अभी भी बढ़ रही है।  अपने देश की आबादी किस कदर बढ़ती गई है इसे आगे प्रस्तुत तालिका से समझा सकता है:

 वर्ष जनसंख्या

 करोड़ों में

  प्रतिशत वृद्धि

  प्रति 10-वर्ष

 जनसंख्या प्रतिशत

  1951 के सापेक्ष

1951 36.01 —– 100
1961 43.92 21.64 122
1971 54.81 24.80 152
1981 68.33 24.66 190
1991 84.64 23.87 235
2001 102.37 21.54 284
2011 121.02 17.64 336

1 करोड़  = 10 मिलियन  = 100 लाख

Source:  http://www.iipsenvis.nic.in/Database/Population_4074.aspx

गौर करें कि 1991 से 2011 के 20 वर्षों के अंतराल में ही देश में करीब 37 करोड़ लोग जुड़ गये और आबादी 1.43 गुना हो गई। और चिंता की बात यह है आज 1917 में अनुमानित आबादी 132-134 करोड़ बताई जा रही है। क्या सीखा देश ने इस जनसंख्या दिवस से? कौन-से कारगर तरीके अपनाए देश ने आबादी नियंत्रित करने के लिए?

मैं पाठकों का ध्यान इस तथ्य की ओर खींचता हूं कि चीन ने 1979 में एक-संतान की कानूनी नीति अपनाई। तब उसकी आबादी लगभग 98 करोड़ थी (भारत की करीब 68 करोड़ उसके सापेक्ष) आज वह 140 करोड़ आंकी जा रही है।

तस्वीर वर्ष 2024 की

हाल में संयुक्त राष्ट्र की विश्व जनसंख्या संबंधी रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसके अनुसार अगले सात वर्षों बाद 2024 में भारत की आबादी चीन के बराबर, फि र उसके अधिक हो जायेगी। यह अनुमान इन आंकड़ों पर आधारित है कि भारत की मौजूदा आबादी करीब 134 करोड़ और वृद्धि दर 1.1% प्रति वर्ष है जब की चीन की आबादी 140 करोड़ और वृद्धि दर मात्र 0.4 % प्रतिवेर्ष है।

इतना ही नहीं, अनुमान यह भी है कि 2030 आते-आते चीन की आबादी करीब-करीब स्थिर हो जायेगी और बाद के वर्षो में उसमें गिरावट भी आ सकती है। इसके विपरीत अपने देश की आबादी 2030 तक 150 करोड़  और बढ़ते हुए 2050 में 166 करोड़ हो जायेगी। उसके बाद उसके स्थिर होने की संभावना रहेगी।

मैं सोचता था कि देश के बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन, सरकारी तंत्र एवं शासन चलाने वाले राजनेता उक्त समाचार से चिंतित होंगे, मुद्दे को लेकर संजीदा होते हुए आम जन को सार्थक संदेश देंगे, और इस दिशा में कारगर कदम उठाने की बात करेंगे। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। किसी भी टीवी चैनल पर कोई बहस चली हो ऐसा भी शायद नहीं हुआ।

आबादी को लेकर कोई भी गंभीर नहीं जब कि यह देश के सामने खड़ी विकट समस्या है जिससे अन्य तमाम समस्याएं पैदा हो रही हैं।

1970 का दुर्भाग्यपूर्ण दशक

बढ़ती आबादी को लेकर जो उदासीनता देखने में आ रही है उसका मूल मेरे मत में 1970 का वह दशक है जिसमें आपातकाल लगा था, इंदिरा गांधी के तथाकथित अधिनायकवादी रवैये के विरुद्ध जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनांदोलन चला था, पहली बार कांग्रेस सत्ताच्युत हुई थी, विपक्षी दलों ने विलय करके जनता पार्टी बनाई और सत्तासीन हुए थे, आदि-आदि। इसी दशक में संजय गांधी (इंदिराजी के छोटे पुत्र) एक असंवैधानिक ताकत के तौर पर उभरे।

बीसवीं सदी के साठ-सत्तर के दशकों में भारत ने परिवार नियोजन की नीति अपनाई थी। मुझे उस समय के “हम दो हमारे दो” के नारे और परिवार नियोजन के कार्यक्रम का द्योतक चिह्न “लाल त्रिकोण” की याद अच्छी तरह है।

संजय गांधी को परिवार नियोजन की योजना बहुत भाई। उनका यह सोचना कि आबादी को बढ़ते देने से देश का दीर्घकालिक अहित निश्चित है। कार्यक्रम तो चल ही रहा था, उसको गति देने के लिए उन्होंने सत्ता से अपनी निकटता का भरपूर किंतु अनुचित लाभ उठाना आरंभ किया। उनके चाटुकारों की कोई कमी नहीं थी और जब वे जोर-जबरदस्ती परिवार नियोजन थोपने लगे तो परिणाम घातक हो गये। मैं उस समय की स्थिति का विवरण नहीं दे सकता। लेकिन वस्तुस्थिति का अंदाजा इसी उदाहरण से लगाया जा सकता है कि अस्पताल कर्मचारियों को नसबंदी के मामले खोज-खोजकर लाना आवश्यक हो गया, अन्यथा तनख्वाह/नौकरी पर आंच आ सकती थी। तब के जनांदोलन में संजय गांधी भी एक कारण बने।

तब परिवार नियोजन कार्यक्रम पर ऐसा ग्रहण लगा कि आज तक उसका कुफल देश को भुगतना पड़ रहा है। परिवार नियोजन ऐसा शब्द बन गया कि राजनेता उसे मुंह से निकालने से भी कतराने लगे। जनसंख्या वृद्धि रोकने की कवायत राजनीति से गायब हो गई। परिणाम?

आज की हमारी आबादी (132+ करोड़) तब (1974-75)  की आबादी (60-62 करोड़) के दोगुने से अधिक हो चुकी है। और जल्दी ही हम चीन को पछाड़ने वाले हैं। इस संभावना पर खुश होवें कि अपना माथा पीटें?

एक अन्य संबंधित समाचार मुझे पढ़ने को मिला (देखें: टाइम्ज़ अव् इंडिया), जिसके अनुसार 2050 तक भारत की मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की मुस्लिम आबादी से अधिक हो जायेगी। अभी सर्वाधिक मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की है, भारत से कुछ करोड़ अधिक। इस विषय की अधिक चर्चा मैं नहीं कर रहा हूं।

कई राज्यों का बेहतर कार्य

वे क्या कारण थे कि राजनेताओं ने बढ़ती आबादी पर खुलकर चर्चा नहीं की? ऐसा तो नहीं कि “आबादी नियंत्रण की कोशिश करने पर जनता कहीं नाखुश न हो जाए और हमें वोट न दें” यह विचार उनके दिमाग में गहरे घुस गया हो? या वे मुद्दे के प्रति एकदम उदासीन हो गए हों। कारण कुछ भी हों देश को बढ़ती आबादी का दंश तो झेलना ही पड़ रहा है।

फिर भी कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में रुचि ली और उसके परिणाम उन्हें मिले भी हैं।

यहां उल्लेख कर दूं कि विषय के जानकारों के अनुसार जनसंख्या के स्थिरता (वृद्धि दर शून्य) के लिए प्रजनन दर करीब 2.1 प्रति स्त्री होनी चहिए। इससे कम पर आबादी घटने लगती है। मैं कुछ गिने-चुने राज्यों के प्रजनन दर के आंकड़े (वर्ष 2016) प्रस्तुत करता हूं (स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_states_ranking_by_fertility_rate):

1) सिक्किम – 1.2 !

2) केरला, पंजाब – 1.6

3) गोवा, तमिलनाडु, त्रिपुरा, दिल्ली, पुद्दुचेरी = 1.7

4) आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल = 1.8

5) हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र = 1.9

6) गुजरात, जम्मू कश्मीर = 2.0

7) अरुणाचल, उत्तराखंड, ओडीसा, हरयाणा = 2.1 

8) आसाम, छत्तीसगढ़ = 2.2

9) मध्य प्रदेश, मिजोरम = 2.3

10) राजस्थान = 2.4

11) झारखंड, मणिपुर = 2.6

12) उत्तर प्रदेश, ) नगालैंड = 2.7 ?

13) मेघालय = 3.0 ?

14) बिहार = 3.4 ?

पूरे देश का औसत प्रजनन दर  2.2  है, स्थिरता वाले मान से थोड़ा अधिक।

इन आंकड़ों को शब्दश: नही लिया जाना चाहिए, किंतु इससे अलग-अलग राज्यों की स्थिति का अंदाजा अवश्य लगता है। छोटे राज्यों का प्रदर्शन अपेक्षया बेहतर रहा है। किंतु उत्तर प्रदेश एवं बिहार जैसे विशाल राज्यो के लिए ये प्रजनन दर अभी बहुत अधिक है, बिहार के लिए तो एकदम चिंताजनक। उत्तर प्रदेश की स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं होगी जितना उपर्युक्त जानकारी संकेत देतीहै।

जनसंख्या वृद्धि एक गंभीर समस्या है इसे एक बच्चा भी समझ सकता है। हमारे प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं। भूक्षेत्र बढ़ नहीं सकता, बनीय क्षेत्र सीमित है, जल से स्रोत सीमित हैं, आदि-आदि। तब इतनी-सी सामान्य बात शासन चलाने वाले और जनता क्यों नहीं समझ पाते हैं कि बढ़ती जनसंख्या के लिए इन संसाधनों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता घटती जाएगी। – योगेन्द्र जोशी